lo aaj hamne tod diya rishta-e-ummeed | लो आज हमने तोड़ दिया रिश्ता-ए-उम्मीद

  - Sahir Ludhianvi

लो आज हमने तोड़ दिया रिश्ता-ए-उम्मीद
लो अब कभी गिला न करेंगे किसी से हम

  - Sahir Ludhianvi

Charagh Shayari

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    क्या ख़ूब तुम ने ग़ैर को बोसा नहीं दिया
    बस चुप रहो हमारे भी मुँह में ज़बान है
    Mirza Ghalib
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    आप दस्ताने पहनकर छू रहे हैं आग को
    आप के भी ख़ून का रंग हो गया है साँवला
    Dushyant Kumar
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    जो यहां ख़ुद ही लगा रक्खी है चारों जानिब
    एक दिन हम ने इसी आग में जल जाना है
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    हमने तुझ पे छोड़ दिया है
    कश्ती, दरिया, भँवर, किनारा
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    जबसे आप गए हो मेरे जीवन से
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    जो तेरी बाँहों में हँसती रही है खेली है
    वो लड़की राज़ नहीं है कोई पहेली है

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    Tajdeed Qaiser
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    कितनी उजलत में मिटा डाला गया
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    रेल को पीछे छोड़ दीया है साँसों की रफ़्तारों ने
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    अपना दिल पेश करूँ अपनी वफ़ा पेश करूँ
    कुछ समझ में नहीं आता तुझे क्या पेश करूँ

    तेरे मिलने की ख़ुशी में कोई नग़्मा छेड़ूँ
    या तिरे दर्द-ए-जुदाई का गिला पेश करूँ

    मेरे ख़्वाबों में भी तू मेरे ख़यालों में भी तू
    कौन सी चीज़ तुझे तुझ से जुदा पेश करूँ

    जो तिरे दिल को लुभाए वो अदा मुझ में नहीं
    क्यूँ न तुझ को कोई तेरी ही अदा पेश करूँ
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    Sahir Ludhianvi
    चेहरे पे ख़ुशी छा जाती है आँखों में सुरूर आ जाता है
    जब तुम मुझे अपना कहते हो अपने पे ग़ुरूर आ जाता है

    तुम हुस्न की ख़ुद इक दुनिया हो शायद ये तुम्हें मालूम नहीं
    महफ़िल में तुम्हारे आने से हर चीज़ पे नूर आ जाता है

    हम पास से तुम को क्या देखें तुम जब भी मुक़ाबिल होते हो
    बेताब निगाहों के आगे पर्दा सा ज़रूर आ जाता है

    जब तुम से मोहब्बत की हम ने तब जा के कहीं ये राज़ खुला
    मरने का सलीक़ा आते ही जीने का शुऊ'र आ जाता है
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    Sahir Ludhianvi
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    किस दर्जा दिल-शिकन थे मोहब्बत के हादसे
    हम ज़िंदगी में फिर कोई अरमाँ न कर सके
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    अभी ज़िंदा हूँ लेकिन सोचता रहता हूँ ख़ल्वत में
    कि अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैंने
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    जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लिया
    जो खो गया मैं उस को भुलाता चला गया
    Sahir Ludhianvi
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