Saghar Siddiqui

Saghar Siddiqui

@saghar-siddiqui

Saghar Siddiqui shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Saghar Siddiqui's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

दो चार दिन की बात है ये ज़िंदगी की बात दो चार दिन के प्यार का क़ाइल नहीं हूँ दोस्त — Saghar Siddiqui
एक वा'दा है किसी का जो वफ़ा होता नहीं वर्ना इन तारों भरी रातों में क्या होता नहीं — Saghar Siddiqui
काँटे तो ख़ैर काँटे हैं इस का गिला ही क्या फूलों की वारदात से घबरा के पी गया — Saghar Siddiqui

Ghazal

मैं इल्तिफ़ात-ए-यार का क़ाइल नहीं हूँ दोस्त सोने के नर्म तार का क़ाइल नहीं हूँ दोस्त मुझ को ख़िज़ाँ की एक लुटी रात से है प्यार मैं रौनक़-ए-बहार का क़ाइल नहीं हूँ दोस्त हर शाम-ए-वस्ल हो नई तम्हीद-ए-आरज़ू इतना भी इंतिज़ार का क़ाइल नहीं हूँ दोस्त दो चार दिन की बात है ये ज़िंदगी की बात दो चार दिन के प्यार का क़ाइल नहीं हूँ दोस्त जिस की झलक से माँद हो अश्कों की आबरू उस मोतियों के हार का क़ाइल नहीं हूँ दोस्त लाया हूँ बे-हिसाब गुनाहों की एक फ़र्द महबूब हूँ शुमार का क़ाइल नहीं हूँ दोस्त 'साग़र' ब-ए-क़द्र-ए-ज़र्फ़ लुटाता हूँ नक़्द-ए-होश मैं साक़ी के उधार का क़ाइल नहीं हूँ दोस्त — Saghar Siddiqui
वक़्त के रंगीं गुल-दस्ते को याद आएगा ठंडा हाथ जब बिखरेंगे वो गेसू तो मर जाएगा ठंडा हाथ भीगी पलकें सोच की उलझन दामन थामे पूछ रही हैं कब तक तार-ए-गरेबाँ यारो सुलझाएगा ठंडा हाथ साज़-ए-तग़ज़्ज़ुल छेड़ने वालो ऐ अफ़्साने लिखने वालो आज लकीरों की तफ़्सीरें दोहराएगा ठंडा हाथ गर्म लहू की बूँदें बोएँ तन्हाई की मिट्टी डालें पतझड़ आए उन शाख़ों पर उग आएगा ठंडा हाथ पत्थर पत्थर जोत जलेगी साहिल साहिल शो'ले होंगे भीगी भीगी सर्द हवा में शरमाएगा ठंडा हाथ बाग़ के माली मेरे ग़ुंचे ग़ैरों ने पामाल किए फिर भी तेरी फुलवारी को महकाएगा ठंडा हाथ — Saghar Siddiqui
पतझड़ में बहारों की फ़ज़ा ढूँड रहा है पागल है जो दुनिया में वफ़ा ढूँड रहा है ख़ुद अपने ही हाथों से वो घर अपना जला कर अब सर को छुपाने की जगह ढूँड रहा है कल रात तो ये शख़्स ज़िया बाँट रहा था क्यूँ दिन के उजालों में दिया ढूँड रहा है शायद के अभी उस पे ज़वाल आया हुआ है जुगनू जो अँधेरे में ज़िया ढूँड रहा है कहते हैं कि हर चाह पे मौजूद ख़ुदा है ये सुन के वो पत्थर में ख़ुदा ढूँड रहा है उस को तो कभी मुझ से मुहब्बत ही नहीं थी क्यूँ आज वो फिर मेरा पता ढूँड रहा है किस शहर-ए-मुनाफ़िक़ में ये तुम आ गए 'साग़र' इक दूजे की हर शख़्स ख़ता ढूँड रहा है — Saghar Siddiqui
आज रूठे हुए साजन को बहुत याद किया अपने उजड़े हुए गुलशन को बहुत याद किया जब कभी गर्दिश-ए-तक़दीर ने घेरा है हमें गेसू-ए-यार की उलझन को बहुत याद किया शम्अ' की जोत पे जलते हुए परवानों ने इक तेरे शो’ला-ए-दामन को बहुत याद किया जिस के माथे पे नई सुब्ह का झूमर होगा हम ने उस वक़्त की दुल्हन को बहुत याद किया आज टूटे हुए सपनों की बहुत याद आई आज बीते हुए सावन को बहुत याद किया हम सर-ए-तूर भी मायूस-ए-तजल्ली ही रहे उस दर-ए-यार की चिलमन को बहुत याद किया मुतमइन हो ही गए दाम-ओ-क़फ़स में 'साग़र' हम असीरों ने नशेमन को बहुत याद किया — Saghar Siddiqui
एक वा'दा है किसी का जो वफ़ा होता नहीं वर्ना इन तारों भरी रातों में क्या होता नहीं जी में आता है उलट दें उन के चेहरे से नक़ाब हौसला करते हैं लेकिन हौसला होता नहीं शम्अ' जिस की आबरू पर जान दे दे झूम कर वो पतिंगा जल तो जाता है फ़ना होता नहीं अब तो मुद्दत से रह-ओ-रस्म-ए-नज़ारा बंद है अब तो उन का तूर पर भी सामना होता नहीं हर शनावर को नहीं मिलता तलातुम से ख़िराज हर सफ़ीने का मुहाफ़िज़ नाख़ुदा होता नहीं हर भिकारी पा नहीं सकता मक़ाम-ए-ख़्वाजगी हर कस-ओ-ना-कस को तेरा ग़म अता होता नहीं हाए ये बेगानगी अपनी नहीं मुझ को ख़बर हाए ये आलम कि तू दिल से जुदा होता नहीं बारहा देखा है 'साग़र' रहगुज़ार-ए-इश्क़ में कारवाँ के साथ अक्सर रहनुमा होता नहीं — Saghar Siddiqui
महफ़िलें लुट गईं जज़्बात ने दम तोड़ दिया साज़ ख़ामोश हैं नग़्मात ने दम तोड़ दिया हर मसर्रत ग़म-ए-दीरोज़ का उनवान बनी वक़्त की गोद में लम्हात ने दम तोड़ दिया अन-गिनत महफ़िलें महरूम-ए-चराग़ाँ हैं अभी कौन कहता है कि ज़ुल्मात ने दम तोड़ दिया आज फिर बुझ गए जल जल के उमीदों के चराग़ आज फिर तारों भरी रात ने दम तोड़ दिया जिन से अफ़्साना-ए-हस्ती में तसलसुल था कभी उन मोहब्बत की रिवायात ने दम तोड़ दिया झिलमिलाते हुए अश्कों की लड़ी टूट गई जगमगाती हुई बरसात ने दम तोड़ दिया हाए आदाब-ए-मोहब्बत के तक़ाज़े 'साग़र' लब हिले और शिकायात ने दम तोड़ दिया — Saghar Siddiqui