पतझड़ में बहारों की फ़ज़ा ढूँड रहा है
पागल है जो दुनिया में वफ़ा ढूँड रहा है
ख़ुद अपने ही हाथों से वो घर अपना जला कर
अब सर को छुपाने की जगह ढूँड रहा है
कल रात तो ये शख़्स ज़िया बाँट रहा था
क्यूँ दिन के उजालों में दिया ढूँड रहा है
शायद के अभी उस पे ज़वाल आया हुआ है
जुगनू जो अँधेरे में ज़िया ढूँड रहा है
कहते हैं कि हर चाह पे मौजूद ख़ुदा है
ये सुन के वो पत्थर में ख़ुदा ढूँड रहा है
उस को तो कभी मुझ से मुहब्बत ही नहीं थी
क्यूँ आज वो फिर मेरा पता ढूँड रहा है
किस शहर-ए-मुनाफ़िक़ में ये तुम आ गए 'साग़र'
इक दूजे की हर शख़्स ख़ता ढूँड रहा है
— Saghar Siddiqui















