आज रूठे हुए साजन को बहुत याद किया
अपने उजड़े हुए गुलशन को बहुत याद किया
अपने उजड़े हुए गुलशन को बहुत याद किया
जब कभी गर्दिश-ए-तक़दीर ने घेरा है हमें
गेसू-ए-यार की उलझन को बहुत याद किया
शम्अ' की जोत पे जलते हुए परवानों ने
इक तेरे शो’ला-ए-दामन को बहुत याद किया
जिस के माथे पे नई सुब्ह का झूमर होगा
हम ने उस वक़्त की दुल्हन को बहुत याद किया
आज टूटे हुए सपनों की बहुत याद आई
आज बीते हुए सावन को बहुत याद किया
हम सर-ए-तूर भी मायूस-ए-तजल्ली ही रहे
उस दर-ए-यार की चिलमन को बहुत याद किया
मुतमइन हो ही गए दाम-ओ-क़फ़स में 'साग़र'
हम असीरों ने नशेमन को बहुत याद किया
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एक वा'दा है किसी का जो वफ़ा होता नहीं
वर्ना इन तारों भरी रातों में क्या होता नहीं
वर्ना इन तारों भरी रातों में क्या होता नहीं
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एक वा'दा है किसी का जो वफ़ा होता नहीं
वर्ना इन तारों भरी रातों में क्या होता नहीं
वर्ना इन तारों भरी रातों में क्या होता नहीं
जी में आता है उलट दें उन के चेहरे से नक़ाब
हौसला करते हैं लेकिन हौसला होता नहीं
शम्अ'' जिस की आबरू पर जान दे दे झूम कर
वो पतिंगा जल तो जाता है फ़ना होता नहीं
अब तो मुद्दत से रह-ओ-रस्म-ए-नज़ारा बंद है
अब तो उन का तूर पर भी सामना होता नहीं
हर शनावर को नहीं मिलता तलातुम से ख़िराज
हर सफ़ीने का मुहाफ़िज़ नाख़ुदा होता नहीं
हर भिकारी पा नहीं सकता मक़ाम-ए-ख़्वाजगी
हर कस-ओ-ना-कस को तेरा ग़म अता होता नहीं
हाए ये बेगानगी अपनी नहीं मुझ को ख़बर
हाए ये आलम कि तू दिल से जुदा होता नहीं
बारहा देखा है 'साग़र' रहगुज़ार-ए-इश्क़ में
कारवाँ के साथ अक्सर रहनुमा होता नहीं
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वक़्त की उम्र क्या बड़ी होगी
इक तेरे वस्ल की घड़ी होगी
इक तेरे वस्ल की घड़ी होगी
दस्तकें दे रही है पलकों पर
कोई बरसात की झड़ी होगी
क्या ख़बर थी कि नोक-ए-ख़ंजर भी
फूल की एक पंखुड़ी होगी
ज़ुल्फ़ बल खा रही है माथे पर
चाँदनी से सबा लड़ी होगी
ऐ अदम के मुसाफ़िरो हुश्यार
राह में ज़िंदगी खड़ी होगी
क्यूँ गिरह गेसुओं में डाली है
जाँ किसी फूल की अड़ी होगी
इल्तिजा का मलाल क्या कीजे
उन के दर पर कहीं पड़ी होगी
मौत कहते हैं जिस को ऐ 'साग़र'
ज़िंदगी की कोई कड़ी होगी
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हर मसर्रत ग़म-ए-दीरोज़ का उनवान बनी
वक़्त की गोद में लम्हात ने दम तोड़ दिया
अन-गिनत महफ़िलें महरूम-ए-चराग़ाँ हैं अभी
कौन कहता है कि ज़ुल्मात ने दम तोड़ दिया
आज फिर बुझ गए जल जल के उमीदों के चराग़
आज फिर तारों भरी रात ने दम तोड़ दिया
जिन से अफ़्साना-ए-हस्ती में तसलसुल था कभी
उन मोहब्बत की रिवायात ने दम तोड़ दिया
झिलमिलाते हुए अश्कों की लड़ी टूट गई
जगमगाती हुई बरसात ने दम तोड़ दिया
हाए आदाब-ए-मोहब्बत के तक़ाज़े 'साग़र'
लब हिले और शिकायात ने दम तोड़ दिया
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हम फ़क़ीरों की सूरतों पे न जा
हम कई रूप धार लेते हैं
हम कई रूप धार लेते हैं
ज़िंदगी के उदास लम्हों को
मुस्कुरा कर गुज़ार लेते हैं
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मैं तल्ख़ी-ए-हयात से घबरा के पी गया
ग़म की सियाह रात से घबरा के पी गया
ग़म की सियाह रात से घबरा के पी गया
इतनी दक़ीक़ शय कोई कैसे समझ सके
यज़्दाँ के वाक़िआत से घबरा के पी गया
छलके हुए थे जाम परेशाँ थी ज़ुल्फ़-ए-यार
कुछ ऐसे हादसात से घबरा के पी गया
मैं आदमी हूँ कोई फ़रिश्ता नहीं हुज़ूर
मैं आज अपनी ज़ात से घबरा के पी गया
दुनिया-ए-हादसात है इक दर्दनाक गीत
दुनिया-ए-हादसात से घबरा के पी गया
काँटे तो ख़ैर काँटे हैं इस का गिला ही क्या
फूलों की वारदात से घबरा के पी गया
'साग़र' वो कह रहे थे कि पी लीजिए हुज़ूर
उन की गुज़ारिशात से घबरा के पी गया
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ऐ दिल-ए-बे-क़रार चुप हो जा
जा चुकी है बहार चुप हो जा
जा चुकी है बहार चुप हो जा
अब न आएँगे रूठने वाले
दीदा-ए-अश्क-बार चुप हो जा
जा चुका कारवान-लाला-ओ-गुल
उड़ रहा है ग़ुबार चुप हो जा
छूट जाती है फूल से ख़ुश्बू
रूठ जाते हैं यार चुप हो जा
हम फ़क़ीरों का इस ज़माने में
कौन है ग़म-गुसार चुप हो जा
हादसों की न आँख खुल जाए
हसरत-ए-सोगवार चुप हो जा
गीत की ज़र्ब से भी ऐ 'साग़र'
टूट जाते हैं तार चुप हो जा
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