अभी तो शाम की दस्तक हुई है
    अभी से लग गया बिस्तर हमारा

    यही तन्हाई है जन्नत हमारी
    इसी जन्नत में है अब घर हमारा
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    Vikas Sharma Raaz
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    एक बरस और बीत गया
    कब तक ख़ाक उड़ानी है
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    मेरी कोशिश तो यही है कि ये मासूम रहे
    और दिल है कि समझदार हुआ जाता है
    Vikas Sharma Raaz
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    फिर वही शब वही सितारा है
    फिर वही आसमाँ हमारा है

    वो जो ता'मीर थी तुम्हारी थी
    ये जो मलबा है सब हमारा है

    वो जज़ीरा ही कुछ कुशादा था
    हम ने समझा यही किनारा है

    चाहता है कि कहकशाँ में रहे
    मेरे अंदर जो इक सितारा है
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    Vikas Sharma Raaz
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    उसे छुआ ही नहीं जो मिरी किताब में था
    वही पढ़ाया गया मुझ को जो निसाब में था

    वही तो दिन थे उजालों के फूल चुनने के
    उन्हीं दिनों मैं अंधेरों के इंतिख़ाब में था

    बस इतना याद है कोई बगूला उट्ठा था
    फिर इस के बाद मैं सहरा-ए-इज़्तिराब में था

    मिरी उरूज की लिक्खी थी दास्ताँ जिस में
    मिरे ज़वाल का क़िस्सा भी उस किताब में था

    बला का हब्स था पर नींद टूटती ही न थी
    न कोई दर न दरीचा फ़सील-ए-ख़्वाब में था

    बस एक बूँद के गिरते ही हो गया आज़ाद
    वो हफ़्त-रंग उजाला जो मुझ हुबाब में था
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    Vikas Sharma Raaz
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    ज़रा लौ चराग़ की कम करो मिरा दुख है फिर से उतार पर
    जिसे सुन के अश्क छलक पड़ें वही धुन बजाओ सितार पर

    ज़रा हैरतों से निकल तो लूँ ज़रा होश आए तो कुछ कहूँ
    अभी कुछ न पूछ कि क्या हुआ मिरा ध्यान अभी है ग़ुबार पर

    कहीं हर्फ़ हर्फ़ गुलाब है कहीं ख़ुशबुओं से ख़िताब है
    मैं ख़िज़ाँ-नसीब सही मगर मिरा तब्सिरा है बहार पर

    मिरे दोस्त तुझ को है क्या पता तुझे दे रहे हैं जो मशवरा
    यही लोग जश्न मनाएँगे मिरी जीत पर तिरी हार पर

    जहाँ हर सिंगार फ़ुज़ूल हों जहाँ उगते सिर्फ़ बबूल हों
    जहाँ ज़र्द रंग हो घास का वहाँ क्यूँ न शक हो बहार पर
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    Vikas Sharma Raaz
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    ज़िंदगी की हँसी उड़ाती हुई
    ख़्वाहिश-ए-मर्ग सर उठाती हुई

    खो गई रेत के समुंदर में
    इक नदी रास्ता बनाती हुई

    मुझ को अक्सर उदास करती है
    एक तस्वीर मुस्कुराती हुई

    आ गई ख़ामुशी के नर्ग़े में
    ज़िंदगी मुझ को गुनगुनाती हुई

    मैं इसे भी उदास कर दूँगा
    सुब्ह आई है खिलखिलाती हुई

    हर अँधेरा तमाम होता हुआ
    जोत में जोत अब समाती हुई
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    Vikas Sharma Raaz
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    कोई उस के बराबर हो गया है
    ये सुनते ही वो पत्थर हो गया है

    जुदाई का हमें इम्कान तो था
    मगर अब दिन मुक़र्रर हो गया है

    सभी हैरत से मुझ को तक रहे हैं
    ये किया तहरीर मुझ पर हो गया है

    असर है ये हमारी दस्तकों का
    जहाँ दीवार थी दर हो गया है

    जिसे देखो ग़ज़ल पहने हुए है
    बहुत सस्ता ये ज़ेवर वो गया है
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    Vikas Sharma Raaz
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    रोज़ ये ख़्वाब डराता है मुझे
    कोई साया लिए जाता है मुझे

    ये सदा काश उसी ने दी हो
    इस तरह वो ही बुलाता है मुझे

    मैं खिंचा जाता हूँ सहरा की तरफ़
    यूँ तो दरिया भी बुलाता है मुझे

    देखना चाहता हूँ गुम हो कर
    क्या कोई ढूँड के लाता है मुझे

    इश्क़ बीनाई बढ़ा देता है
    जाने क्या क्या नज़र आता है मुझे
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    Vikas Sharma Raaz
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    इरादा तो नहीं है ख़ुद-कुशी का
    मगर मैं ज़िंदगी से ख़ुश नहीं हूँ
    Vikas Sharma Raaz
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