use chhua hi nahin jo mirii kitaab men tha | उसे छुआ ही नहीं जो मिरी किताब में था

  - Vikas Sharma Raaz

उसे छुआ ही नहीं जो मिरी किताब में था
वही पढ़ाया गया मुझ को जो निसाब में था

वही तो दिन थे उजालों के फूल चुनने के
उन्हीं दिनों मैं अंधेरों के इंतिख़ाब में था

बस इतना याद है कोई बगूला उट्ठा था
फिर इस के बाद मैं सहरा-ए-इज़्तिराब में था

मिरी उरूज की लिक्खी थी दास्ताँ जिस में
मिरे ज़वाल का क़िस्सा भी उस किताब में था

बला का हब्स था पर नींद टूटती ही न थी
न कोई दर न दरीचा फ़सील-ए-ख़्वाब में था

बस एक बूँद के गिरते ही हो गया आज़ाद
वो हफ़्त-रंग उजाला जो मुझ हुबाब में था

  - Vikas Sharma Raaz

Gulshan Shayari

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