Haider Khan

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Haider Khan shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Haider Khan's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ये और बात कि तुझ से गिला नहीं करते वगरना अपनी नज़र से छिपा तो कुछ भी नहीं — Haider Khan
इस क़दर ख़ुद से बना रक्खी है दूरी मैं ने ख़ुद पहुँचती नहीं मुझ तक ही सदाएँ मेरी — Haider Khan
आप को पूरी तरह ख़ुद से मिटाने के बा'द ख़ुद में झाँका तो हमें कुछ भी हमारा न मिला — Haider Khan
ख़्यालों से ज़रा हट कर हक़ीक़त पर नज़र डालो ये दुनिया वो नहीं है जो किताबों में पढ़ा तुम ने — Haider Khan
कभी उस को हम अपनी रूह का पैकर समझते थे बहुत नादान थे मक़्तल को अपना घर समझते थे — Haider Khan
बातें करो तो ऐसी कि दुनिया यक़ीं करे ये क्या कि तुम को मेरा कोई मिस्ल मिल गया — Haider Khan
अब वो मेरे साथ है यारों अब मंज़िल का क्या ग़म है रस्ता थोड़ा और बढ़ा दो मुझ को चलते जाना है — Haider Khan
उस के हाथों में कुद्रत ने ऐसी दी है मसीहाई सीने पर वो हाथ रखे तो ज़ख्म-ए-दिल भर जाता है — Haider Khan
यही इक हल बचा है अब मिरी नाराज़गी का उसे बोलो मिरे अंदाज़ में मुझ को मनाए — Haider Khan
अब इस लिए नहीं आती बहार घर मेरे कि इक गुलाब का दिल मेरे हाथों टूट गया — Haider Khan
हमारे आबा-ओ-अज्दाद से विरासत में ज़मीं नहीं न सही पर हमें किताब मिले — Haider Khan
तुम अपनी बात पे क़ाएम हो आख़िरी दम तक हटाओ छोड़ो ये ख़्वाब-ओ-ख़याल की बातें — Haider Khan
मुझ से मिलना हो जिसे दिन के उजालों में मिले ख़ुद से रहती है मुलाक़ात मिरी शाम के बा'द — Haider Khan
बना के रख दिया नक़्शा तिरे मोहल्ले का उस एक शख़्स ने जिस को तू जानता भी नहीं — Haider Khan
अभी भी अपनी किताबों के पिछले पन्ने पर तुम्हारे नाम को लिखते हैं फिर मिटाते हैं — Haider Khan
उस ने पूछा कैसे मुमकिन है मेरे दिल तक जाना मैं ने कहा तुम उर्दू सीखो रस्ता बनते जाना है — Haider Khan
फ़क़त दो-चार ईदें और बढ़ा दे साल में या रब गले बाबा के लगने को बहाने चाहता हूँ मैं — Haider Khan
क्या भला हम को पता हो किसी मौसम के सितम बाप साया किए हम पर जो खड़ा रहता है — Haider Khan

Ghazal

तेग़ चले या तीर चले वो सजदे करता जाएगा तेरा चाहने वाला मरते दम तक तुझ को चाहेगा शाम भी चुप है मैं भी चुप हूँ तू भी चुप है कुछ तो बोल इतना शोर शराबा मुझ को अंदर से खा जाएगा एक किनारे मैं गुम-सुम सा एक किनारे तू ख़ामोश इतनी दूरी और ये आलम कोई तो बीच में आएगा नाम किसी का होगा लब पर दिल में और कोई होगा या'नी तीर कहीं साधेंगे मारा कोई जाएगा यार समझ तू रोटी कपड़ा क़र्ज़ परेशानी और घर ये सारा कुछ छोड़ के कोई कब तक तुझे मनाएगा एक कहानी में दो लोग हैं कुछ तो सुना सुना सा है मुझ को लगता है ये लड़का फिर से धोखा खाएगा इश्क़ में क्या डरना क्या होगा दिल थामों और कूद पड़ो या तो दिल टूटेगा अपना या दिल तोड़ा जाएगा तैश में आ कर सारे खिलौने उस ने तोड़ दिए लेकिन मुझ को छोड़ दिया है वर्ना दिल कैसे बहलाएगा सूरज चाँद सितारे शबनम वैसे तो सब अच्छे हैं लेकिन उस को जो भाएगा हम को बस वो भाएगा हम भी पागल थे जो बिछड़ते वक़्त ये शर्त लगा बैठे कौन किसे पहले भूलेगा कौन किसे तड़पाएगा काम हमारा क्या है 'हैदर' उन की गली में जाएँगे या तो सर फोड़ेंगे दर पर या सर फोड़ा जाएगा — Haider Khan
किसी को खोने के डर से वो डर गया आख़िर चलो कहीं तो वफ़ा वो भी कर गया आख़िर हर एक ऐब में ख़ूबी दिखाई देने लगी कोई हमारे भी दिल में उतर गया आख़िर बिछड़ते वक़्त हुए फिर से अजनबी दोनों सो राएगाँ ही ये सारा सफ़र गया आख़िर ख़ुशी हुई कि परिंदों को मिल गया दाना कोई तो रिज़्क़ लिए अपने घर गया आख़िर तेरे ख़ुतूत से आवाज़ तेरी आती थी वो दौर-ए-इश्क़ न जाने किधर गया आख़िर मैं सिगरेटें तो जलाता हूँ पी नहीं पाता तुम्हारे हिज्र का जो था असर गया आख़िर नज़र चुराने लगे तुम भी गुफ़्त-ओ-गू के बीच तुम्हारा दिल भी मेरे ग़म से भर गया आख़िर वो हादसा है जवानी कि क्या कहें "हैदर" जो एक बच्चा था मुझ में वो मर गया आख़िर — Haider Khan
पूजा हो या इबादत हर काम है मोहब्बत मंदिर हो या हो मस्जिद पैग़ाम है मोहब्बत ख़ुद से हो या ज़माँ से या फिर हो दो-जहाँ से हर जंग जिस ने जीती वो नाम है मोहब्बत बहते लहू को देखो इन गद्दियों को देखो करती है सब सियासत बदनाम है मोहब्बत देखो ज़मीं के हिस्से में आसमाँ नहीं है सोचो ज़रा कि कितनी नाकाम है मोहब्बत तेरे बग़ैर गुज़रे तो ज़िंदगी सज़ा है तू साथ हो अगर तो हर शाम है मोहब्बत ता'रीफ़ होगी पहले फिर राब्ता बढ़ेगा हम ने सुना है इस का अंजाम है मोहब्बत फ़रहाद हो या मजनू हो मीर या हो ग़ालिब सब कटघरे में आएँ इल्ज़ाम है मोहब्बत — Haider Khan

Nazm

"गुफ़्त-ओ-गू" मेरे वतन तू प्यारे मिरे मुल्क-ए-मोतबर हालत पे आज अपनी ज़रा डाल इक नज़र क्या मिल सका है उन के लहू का सिला उन्हे तेरे लिए कफ़न में जो लौटे थे अपने घर अज़्मत को अपनी भूल रहा है तू ऐ वतन मेरे लबों से सुन ले ये किस्सा-ए-मुख़्तसर चाहे हो फ़लसफ़ा या रियाज़ी की बात हो तू ने ही तो जहाँ को सिखाए थे ये हुनर शतरंज किस की देन है दुनिया को कौन था तू ही तो था जहान की इक शम-ए-रहगुज़र क्यूँ भूलता है अपनी तू अज़्मत की दास्ताँ मेरे लबों से सुन ले ये किस्सा-ए-मुख़्तसर जब गुम हुआ वजूद सियह रात में तिरा कुर्बाँ हुए थे चाँद कई तब हुई सहर सींची गई लहू से ज़मीं गुल्सिताँ की जब तब जा के गुल खिले थे कई रंग के इधर बोया गया था जो कभी इन्सानियत का बीज क़ायम है उस के दम से ज़माने में इक शजर आज़ाद हो गए हैं सभी जिस्म क़ैद से क्यूँ सोच सब की आज भी है क़ैद में मगर हम भी शजर थे एक इसी गुल्सिताँ के और कुर्बान हम ने कर दिए तुझ पे सभी समर इल्ज़ाम फिर भी है कि वफ़ादार हम नहीं मज़हब के हैं वतन के अलम-दार हम नहीं मिट्टी से तेरी हम को है उल्फ़त कुछ इस क़दर सजदा ख़ुदा का करते हैं इस पर लगा के सर मज़हब है अव्वलीन तो मज़हब की बात सुन मज़हब ये कह रहा है वफ़ाएँ वतन से कर मेरे वतन अमीन मिरे मेरे हम-नज़र नज़रों में मेरी अब भी है तू एक ताजवर तुझ से लिया है हम ने ये पैमान ऐ वतन कुर्बाँ हमारी तुझ पे है मुस्कान ऐ वतन कुर्बाँ हमारे तुझ पे दिल-ओ-जान ऐ वतन कुर्बाँ हैं आज कल भी हैं कुर्बान ऐ वतन कुर्बाँ हमारे तुझ पे सब अरमान ऐ वतन है आन-बान शान भी कुर्बान ऐ वतन — Haider Khan
सरहद कभी सरहद पे जब दुश्मन ने अंगारें बिछाईं थीं हिमालय पर वो जब बारूद की नदियाँ बहाईं थीं यही था वक़्त जब हम को वतन की इक सदा आई ख़ुशी से सैकड़ों जाने वतन पर तब लुटाईं थीं मैं इक घर छोड़ आया था, करोड़ों घर बचाने थे कई वादे वतन से जो किए थे वो निभाने थे वफ़ा मेरी कभी सरहद से आ कर पूछ लेना तुम लहू मेरा वहीं छलका जहाँ गुज़रे ज़माने थे मेरी वर्दी से तो अब तक वफ़ा की ख़ुशबू आती है फज़ा ये आज भी क़िस्से शहादत के सुनाती है सदाएं जब कभी जन गण की उठती हैं यहाँ पर तो फ़लक ये काँप उठता है, ज़मीं ये थरथराती है इसी सरहद पे माँओं ने कई बेटे गंवाए थे इसी सरहद पे भाई से बिछड़ कर बहने रोईं थीं किसी ने जब जवाँ बेटे का लाशा सामने देखा न जाने कितने बरसों तक वो आँखें फिर न सोईं थीं मेरा भी एक क़िस्सा था, मेरी भी इक कहानी थी वतन के नाम मैं ने भी लिखी अपनी जवानी थी कई बातें थी दिल में जो कभी मैं कह नहीं पाया मुझे भी दास्ताँ सारी किसी को तो सुनानी थी कई लोगों का होगा ज़िक्र मेरे इस फ़साने में कई लोगों से बिछड़ा हूँ मैं सरहद को बचाने में मैं घर का इक दिया था जो के रौशन हो रहा था और किसी झोके ने इक पल भी नहीं सोचा बुझाने में मेरे दर से कभी बाद-ए-सबा तेरा गुज़र हो तो मेरी महबूब से कहना उसे मैं याद करता था मेरी हस्ती मिटे लेकिन उसे इक आँच ना आए ख़ुदा से हर घड़ी मैं बस यही फरयाद करता था उसे ये पूछना के क्या सुनाई दे रहा हूँ मैं उसे क्या अपनी बेटी में दिखाई दे रहा हूँ मैं उसे कहना के आँखों में नमी अच्छी नहीं लगती बड़ा मजबूर हो कर ये जुदाई दे रहा हूँ मैं उसे कहना उसे मैं फिर किसी दिन मिलने आउँगा सुब्ह की धूप सा चहरे पे उस के झिलमिलाउँगा मिला हूँ मैं जो इस मिट्टी में तो फिर एक ना इक दिन कोई पौधा बनूँगा और फिर मैं लहलाहाऊंगा मेरी मां से ये कह देना के उस के हाथ का ख़ाना मैं ख़ाना चाहता तो था मगर ये हो नहीं पाया मुझे इक ख़त मिला था जिस में मां ने घर बुलाया था मैं जाना चाहता तो था मगर ये हो नहीं पाया मेरी मां से ये कहना के दुआ ने रंग लाया है तेरा बेटा लहू में भीग कर भी मुस्कुराया है उसे कहना ये वा'दा था उसे मैं मिलने आउँगा क़फ़न में ही सही मैं ने ये वा'दा भी निभाया है मेरे बाबास भी पूछो उन्हें क्या गर्व है मुझ पर वतन की आन की ख़ातिर जो मैं ने जाँ गवाई थी उन्हें कहना के बेटा आप का वादे का पक्का है न पीछे वो हटा, गोली सभी सीने पे खाई थी उन्हें कहना की उन सी शख़्सियत ना है ज़माने में न ऐसी दौलतें मिलती हैं जन्नत के खज़ाने में मेरी बहनों से मिलना तो उन्हें पैगाम ये देना के भाई अब नहीं तो क्या ख़ुदाई तो सलामत है हुआ क्या जो के दुश्मन ने किया धड़ से अलग सर को लो बांधों राखियां इस में कलाई तो सलामत है जो बहनों के लिए हो पुर-फ़ज़ा वो बन के आऊँगा हिफाज़त जो करे उन की दुआ वो बन के आऊँगा कभी सरहद को फिर मेरी ज़रूरत गर पड़ी तो मैं जो ललकारेगी दुश्मन को सदा वो बन के आऊँगा मुझे मुर्दा जो कहते हैं उन्हें जा कर ये कह देना तिरंगे को जो लहराए हवा वो बन के आऊँगा — Haider Khan
आइना मैं किसी का आइना हूँ और ऐसा आइना हूँ जब कभी मुझ में वो ख़ुद को देखता है सोचता है क्या हसीं सच में है इतना वो या उस को मैं हसीं दिखला रहा हूँ बन-सँवर कर फिर वो चलता है लटें खोले हुए और देखता है बारहा ख़ुद को पलट कर और फिर वो सोचता है क्या मैं सच्चा हूँ या झूठा हूँ मगर फिर दिल ही दिल में वो ख़ुशी से मुस्कुरा कर सोचता है आइना सच बोलता है हाँ मगर जब भी कभी मैं उस को उस की ख़ामियों से रू-ब-रू करवाऊँ तब वो घूरता है इस क़दर मुझ को के जैसे जुर्म कोई कर दिया हो उस की आँखों से छलकता है ग़ज़ब ऐसा के जैसे घूर कर ही तोड़ देगा वो मुझे और छोड़ देगा ज़र्रा ज़र्रा इस ज़मीं पर और फिर धीरे से उठ कर वो चला जाता है मेरे सामने से फिर पलट कर भी नहीं मुझ को कभी वो देखता है और दिल ही दिल में ख़ुद से बोलता है इस जहाँ में कोई भी सच्चा नहीं अपना नहीं आइना झूठा है इस की बात में आना नहीं। — Haider Khan
ख़त मैं रात था वो के जिस में तुम ने छुपाए थे सारे अश्क अपने तुम्हारे आँगन की वो सुब्ह था के जिस में तुम मुस्कुरा रही थी मैं साज़ था वो पनाह जिस की तुम्हारे हाथों की नर्मियाँ थीं मैं गीत था वो के जिस को इतनी ख़ुशी से तुम गुनगुना रही थी मैं साथ था हर क़दम तुम्हारे मैं अक्स जैसे के बन गया था मगर जो अब हम बिछड़ चुके हैं तो ख़ुद को तुम अब सँभाल लेना अगर कभी मैं जो याद आऊँ तो मेरा ख़त तुम निकाल लेना उसे जो पढ़ना तो फिर ख़ुशी से उसे हवा में उछाल देना वो सारी बातें जो मैं ने उस में लिखी हैं जाना वो जी उठेंगी हिना सी ख़ुशबू महक उठेगी, फ़ज़ा में बाद-ए-सबा चलेगी तुम्हारे लब मुस्कुरा उठेंगे, तुम्हारी आँखों में अश्क होंगे तुम्हारी यादों के मोड़ पर मैं खड़ा मिलूँगा तुम्हें उसी पल हमारी क़ुर्बत के सारे लम्हे हमारी मजबूरियों का आलम वो सारी बातें जो हम पे गुज़रीं वो ख़त में मेरे लिखी हुई हैं तुम्हारी मख़मूर सी वो आँखें तुम्हारी ख़ुशबू तुम्हारी यादें अभी भी जैसे ग़ुलाब बन कर मेरी ग़ज़ल में खिली हुई हैं — Haider Khan
तुम यूँँ कभी लगता है मानो तुम हो उन पत्तों के जैसी जो के पतझड़ में भी शाखों पर खिले रहते हैं हर दम जो हवाओं के तरानों पर हमेशा झूमते हैं ज़िंदगी भर आह-ओ-नाला दर्द-ओ-ग़म में वो रहे हैं हाँ मगर फिर भी मोहब्बत से शजर को चूमते हैं तुम कभी लगती हो उस महताब की मानिंद मुझ को मैं जिसे बाम-ए-फ़लक पर मुस्कुराता देखता हूँ वो के जिस की रौशनी में रात भर मैं भीगता हूँ पा नहीं सकता उसे मिलता है फिर भी क्यूँ सूकूं सा जब कभी दरिया में उस का अक्स बनता देखता हूँ फिर कभी उस रात का इक रूप लगती हो मुझे तुम जो मेरी दिन भर की सारी ही थकन को चूर कर दे जब कभी दुनिया के रंज-ओ-ग़म से मैं आजिज़ हो जाऊँ वो मुझे आग़ोश में ले कर ग़मों को दूर कर दे तुम कभी उस ख़्वाब के जैसी भी लगती हो मुझे जो हर सुब्ह चहरे पे इक मुस्कान दे जाता है यूँँ ही ख़्वाब ऐसा के नहीं आसान जिस को भूल पाना दिल गवारा कर नहीं सकता है जिस का टूट जाना ख़ूब-सूरत है सभी बातें तुम्हारी और तुम ख़ूब-सूरत है ये अंदाज़-ए-बयां जो है तुम्हारा वो तुम्हारा प्यार से कहना के चलते हैं कहीं हम दूर सहराओं में चल कर काटते हैं ज़िंदगी हम कौन हो तुम और क्या लगती हो मेरी क्या पता क्यूँ मैं तुम सेे आ मिला और क्या है अपना राबता इन सवालों का ज़ख़ीरा इस जहाँ पर छोड़ दो जो नहीं है अपने बस में वो ख़ुदा पर छोड़ दो — Haider Khan
रिवाज अजब रिवाज हैं दुनिया ने जो बनाएँ हैं, के औरतें तो घरों के लिए बलाएँ हैं। किसी ने बोझ समझ कर घरों में रक्खा तो, किसी ने बोल दिया ये तो बद-दुआएँ हैं। किसी ने ज़ुल्म किया इन पे और फिर बोला, के औरतें तो फ़कत मर्द की क़बाएँ हैं। जो मर्द ओढ़ ले जब भी कभी हो जी उस का, या फिर उतार के पामाल वो करे उनको। कभी उठा के उन्हें ताज सा रखे सर पर, कभी अज़ाब सा बद-हाल वो करे उनको। जो लोग आज है मूरत बने शराफ़त की, ख़ुद औरतों को निगाहों से तौल देते हैं। उछालते हैं शहर भर में इज़्ज़तें सबकी, घरों में लौट के फिर माँ के पाँव छूते हैं। है औरतों की भी इज़्ज़त ये भूल जाते हैं, ये उन की शक्ल पे बदना मियाँ सजाते हैं। ये जिस की कोख में पाते हैं ज़िन्दगी अपनी, उसी की ज़ात को सौदे में बेच खाते हैं। हवस की आग बुझाने के वास्ते ये लोग, किसी के जिस्म से जब मन हो खेल आते हैं। ये औरतें ही तो होती हैं हौसलों की मिसाल, फिर आज क्यूँ हैं ज़माने के सामने ये निढाल। गली-गली से गुज़रती है सहमी सी औरत, क़दम-क़दम पे सताता है आबरू का ख़याल। अगर बचा न सकी आज आबरू अपनी, तो ये समाज उसी से तो फिर करेगा सवाल। — Haider Khan