पुकारता था कोई जब तो हम नहीं ठहरे
जहाँ हमारी ज़रूरत न थी वहीं ठहरे
जहाँ हमारी ज़रूरत न थी वहीं ठहरे
इस एक डर से लगातार चल रहे हैं हम
जुदा हो जाएँगे हम तुम अगर कहीं ठहरे
कभी कभी तो मैं दरिया भी रोक देता हूँ
कभी कभी तो मेरे अश्क ही नहीं ठहरे
अना में गुम है वो अपनी सो अब ये बेहतर है
ठहर गया है जहाँ भी वो अब वहीं ठहरे
यूँ कब तलक मैं उसे रोकता रहूँ 'हैदर'
कभी वो ख़ुद भी तो सोचे कि वो यहीं ठहरे
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क्या भला हम को पता हो किसी मौसम के सितम
बाप साया किए हम पर जो खड़ा रहता है
बाप साया किए हम पर जो खड़ा रहता है
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हाल-ए-दिल क्यूँ न तुझे आज सुनाएँ ये बता
क्यूँ भला इश्क़ के जज़्बे को दबाएँ ये बता
क्यूँ भला इश्क़ के जज़्बे को दबाएँ ये बता
हम तो इस जुर्म-ए-मोहब्बत में जले जाते हैं
इस की अब हम को तू क्या देगा सज़ाएँ ये बता
सब तो ज़ाहिर हुए जाता है मेरे चेहरे से
राज़-ए-उल्फ़त को भला कैसे छुपाएँ ये बता
दिल की बस्ती को तेरे आने पे रौशन कर दें
या तेरे जाने पे हम इस को जलाएँ ये बता
तेरे पैरों में झनकती हुई पायल बांधे
या तेरे माथे पे इक बोसा सजाएँ ये बता
तेरी आँखों के समुंदर में कहीं डूब चलें
या तेरे क़दमों पे तारों को बिछाएँ ये बता
तुझ से आँखों को मिलाते हुए इज़हार करें
या कि इज़हार में नज़रों को झुकाएँ ये बता
हम किसी और सफ़र का कहीं आगाज़ करें
या तेरे साथ ही अब शहर बसाएँ ये बता
हम को घाइल किया लहजे ने कभी नज़रों ने
ये अदाएँ हैं तेरी या हैं जफ़ाएँ ये बता
कुछ उसूलों पे टिका होता है रिश्तों का शजर
अब यही चीज़ तुझे कैसे सिखाएँ ये बता
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चहरे तमाम तुम ये शहर भर के देख लो
मिल जाएँ हम कहीं तो ठहर कर के देख लो
मिल जाएँ हम कहीं तो ठहर कर के देख लो
जिस मोड़ तक हमारी ये राहें न हों जुदा
उस मोड़ तक ही साथ सफ़र कर के देख लो
ये रात भी हसीं हैं अगर हो नहीं यक़ीं
तो आज मेरे साथ बसर कर के देख लो
इक बार तो उठा लो मोहब्बत की इक नज़र
इक बार तो निगाहें इधर कर के देख लो
जो है नहीं तुम्हारा उसे भूल जाओ तुम
जो है तुम्हारा उस की क़दर कर के देख लो
तुम कर रहे हो जो ये मोहब्बत की आरज़ू
अंजाम तो बुरा है मगर कर के देख लो
वो इंतिज़ार में हैं के 'हैदर' मिलोगे तुम
उन की गली से आज गुज़र कर के देख लो
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ये कौन है आँखों का ये धोखा है के तू है
तस्वीर में कोई तेरे जैसा है के तू है
तस्वीर में कोई तेरे जैसा है के तू है
मुड़ मुड़ के जिसे राह में तक़ता हूँ मैं हर दम
वो कौन है बीता वो ज़माना है के तू है
जो बाम-ए-फ़लक पर कहीं रौशन है वही शय
मेहताब है क्या है कोई तारा है के तू है
चेहरे पे शिकन है मेरे मैं सोच रहा हूँ
ये शे'र महज़ लफ़्ज़ों का मेला है के तू है
सहरा में कहीं दूर झलकता है जो चेहरा
वो थक के मुसाफ़िर कोई बैठा है के तू है
खोने को मेरे पास न था कुछ तो मैं ख़ुश था
पर अब मुझे ये ख़ौफ़ सताता है के तू है
मैं राह में तन्हा हूँ मगर फिर भी न जाने
जब बाद-ए-सबा चलती है लगता है के तू है
जब धूप में जलते हुए तन को मिली राहत
सोचा किसी बादल का ये साया है के तू है
आँखों की चमक देख के ये सोच रहा हूँ
आँखों में मेरी ख़्वाब समाया है के तू है
ये कौन है किस ने है लगाई मेरी बोली
आख़िर ये ख़रीदार ज़ुलेख़ा है के तू है
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