पुकारता था कोई जब तो हम नहीं ठहरे

जहाँ हमारी ज़रूरत न थी वहीं ठहरे

इस एक डर से लगातार चल रहे हैं हम
जुदा हो जाएँगे हम तुम अगर कहीं ठहरे

कभी कभी तो मैं दरिया भी रोक देता हूँ
कभी कभी तो मेरे अश्क ही नहीं ठहरे

अना में गुम है वो अपनी सो अब ये बेहतर है
ठहर गया है जहाँ भी वो अब वहीं ठहरे

यूँ कब तलक मैं उसे रोकता रहूँ 'हैदर'
कभी वो ख़ुद भी तो सोचे कि वो यहीं ठहरे

— Haider Khan

More by Haider Khan

Other ghazal from the same pen

See all from Haider Khan →

Samundar Shayari

Shers of samundar.

All Samundar Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling