नए सपने सजाने में ज़माने बीत जाते हैं
किसी मंज़िल को पाने में ज़माने बीत जाते हैं
जिसे दिल में बसाने में ज़रा सा वक़्त लगता है
उसे दिल से भुलाने में ज़माने बीत जाते हैं
ये दिल मजबूर होता है तो पत्थर बन ही जाता है
इसे फिर दिल बनाने में ज़माने बीत जाते है
कोई जब रूठ जाए तो उसे झट से मना लोगे
मगर ख़ुद को मनाने में ज़माने बीत जाते हैं
भरोसे का जो टूटा सा महल लेकर बिछड़ता है
उसे वापस बुलाने में ज़माने बीत जाते हैं
कोई वा'दा जो करना हो तो फिर इक पल नहीं लगता
मगर वादे निभाने में ज़माने बीत जाते हैं
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