नहीं नहीं हमें हालात से गुरेज़ नहीं
महाज़-ए-इश्क़ है सो मात से गुरेज़ नहीं
सही ग़लत हो कोई झूठ हो हक़ीक़त हो
हमें तुम्हारी किसी बात से गुरेज़ नहीं
हर इक जवाब का मौज़ूअ' तुम हो सो चुप हैं
वगर्ना हम को सवालात से गुरेज़ नहीं
भुला सके हैं तुम्हें कितनी मुश्किलों से हम
ये कैसे कह दें मुलाक़ात से गुरेज़ नहीं
तुम्हारे दर से अगर अब्र हो के ना गुज़रे
तो फिर हमें कभी बरसात से गुरेज़ नहीं
ये दिल भी अक़्ल की बातों में आ रहा है क्यूँ
कहीं इसे भी तो जज़्बात से गुरेज़ नहीं
हर एक राह-ए-तख़य्युल पे नक़्श-ए-पा है तिरा
गुरेज़ मुझ से ख़यालात से गुरेज़ नहीं
ये जाँ हथेली पे रखते हैं हम अली के ग़ुलाम
किया कभी शब-ए-ज़ुल्मात से गुरेज़ नहीं
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