हर एक धड़कन का बस यही है पयाम तुझ को
मिरे वतन ऐ मिरे चमन है सलाम तुझ को
जहाँ भी जाऊँ सबा ये कहती है आ के मुझ से
पुकारती है तिरे वतन की वो शाम तुझ को
जहाँ ज़माने की हद है वो है उरूज तेरा
भला लगाएगा क्या ज़माना लगाम तुझ को
तिरे ही क़दमों के पीछे पीछे जहाँ चला है
ज़माना कहता है अज़्मतों का इमाम तुझ को
है आसमाँ की बुलंदियों पर तिरा तिरंगा
मिला शहीदों के सदक़े ऐसे मक़ाम तुझ को
लहू हिमालय की चोटियों से टपक रहा है
सदा ये उठती है लेना है इंतिक़ाम तुझ को
हर एक बुल्बुल ही गुलिस्ताँ की ये कह रही है
रहे सलामत तू ऐ वतन है सलाम तुझ को
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