किसी को खोने के डर से वो डर गया आख़िर

चलो कहीं तो वफ़ा वो भी कर गया आख़िर

हर एक ऐब में ख़ूबी दिखाई देने लगी
कोई हमारे भी दिल में उतर गया आख़िर

बिछड़ते वक़्त हुए फिर से अजनबी दोनों
सो राएगाँ ही ये सारा सफ़र गया आख़िर

ख़ुशी हुई कि परिंदों को मिल गया दाना
कोई तो रिज़्क़ लिए अपने घर गया आख़िर

तेरे ख़ुतूत से आवाज़ तेरी आती थी
वो दौर-ए-इश्क़ न जाने किधर गया आख़िर

मैं सिगरेटें तो जलाता हूँ पी नहीं पाता
तुम्हारे हिज्र का जो था असर गया आख़िर

नज़र चुराने लगे तुम भी गुफ़्त-ओ-गू के बीच
तुम्हारा दिल भी मेरे ग़म से भर गया आख़िर

वो हादसा है जवानी कि क्या कहें "हैदर"
जो एक बच्चा था मुझ में वो मर गया आख़िर

— Haider Khan

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