शा'इरी क्या क्या ग़ज़ल क्या शे'र सब फ़न की दुकान
क्या सुख़न-वर सब हुए बैठे हैं क़तरन की दुकान
किसलिए हंगामा-ए-महशर बपा है किसलिए
एक रहज़न लूटता है एक रहज़न की दुकान
सज गई हैं गीता-ओ-क़ुरआन घर की ताक़ पर
ख़ूब चलती है सो अब शैख़-ओ-बरहमन की दुकान
क्या ख़ुदा कैसा पयम्बर दीन क्या किस को ख़बर
हाँ मगर चलती है अच्छी अपनी मदफ़न की दुकान
जाइए उस दर पे जा कर रोज़ माथा फोड़िए
और चलने दीजिए ये चाक दामन की दुकान
कीजिए हैदर फिर उन की याद से सौदा कोई
यूँ ही चलने दीजिए अब अपनी धड़कन की दुकान
— Haider Khan















