chhupa ke zehan men ik roz bhool jaane the | छुपा के ज़ेहन में इक रोज़ भूल जाने थे

  - Haider Khan

छुपा के ज़ेहन में इक रोज़ भूल जाने थे
क़लम ने खोल दिए राज़ जो छुपाने थे

जो ज़ख़्म खाएँ हैं सारे नहीं दिखाने थे
अब इस क़दर भी मरासिम नहीं बढ़ाने थे

मेरे नसीब में दर दर की ठोकरें ही रहीं
मुझे सफ़र में नए रास्ते बनाने थे

उसी की आँख के आँसू बने हुए हैं हम
वो जिस के नाम पे सब दिल के कारख़ाने थे

हर इक किताब का पन्ना उसी के नाम का था
वो 'उम्र क्या थी वो क्या दिन थे क्या ज़माने थे

उदास हो के ये कहता है गाँव का बरगद
हुई है शाम परिंदे तो लौट आने थे

  - Haider Khan

Bekhayali Shayari

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