छुपा के ज़ेहन में इक रोज़ भूल जाने थे
क़लम ने खोल दिए राज़ जो छुपाने थे
जो ज़ख़्म खाएँ हैं सारे नहीं दिखाने थे
अब इस क़दर भी मरासिम नहीं बढ़ाने थे
मेरे नसीब में दर दर की ठोकरें ही रहीं
मुझे सफ़र में नए रास्ते बनाने थे
उसी की आँख के आँसू बने हुए हैं हम
वो जिस के नाम पे सब दिल के कारख़ाने थे
हर इक किताब का पन्ना उसी के नाम का था
वो 'उम्र क्या थी वो क्या दिन थे क्या ज़माने थे
उदास हो के ये कहता है गाँव का बरगद
हुई है शाम परिंदे तो लौट आने थे
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Haider Khan
our suggestion based on Haider Khan
As you were reading Bekhayali Shayari Shayari