दिल भी हर रोज़ यही एक ख़ता करता है
ज़ख़्म खाता है मगर फिर भी वफ़ा करता है
हुस्न-ए-अख़्लाक़ के पर्दे में जफ़ा करता है
छीन कर क़ुव्वत-ए-पर्वाज़ रिहा करता है
इस में सोचा था छिपा लूँगा मैं ज़ख़्मों को मगर
तेरा दामन मेरे ज़ख़्मों को हरा करता है
निस्फ़ शब मुझ को जगा देती है आवाज़ कोई
मुझ में इक शख़्स रिहाई की दुआ करता है
दिल गुनहगार है काफ़र तो नहीं ऐ वाइज़
सर झुके या न झुके ज़िक्र-ए-ख़ुदा करता है
— Haider Khan















