Mushafi Ghulam Hamdani

Mushafi Ghulam Hamdani

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Mushafi Ghulam Hamdani shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Mushafi Ghulam Hamdani's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

'मुसहफ़ी' फ़ारसी को ताक़ पे रख अब है अशआर-ए-हिंदवी का रिवाज — Mushafi Ghulam Hamdani
सादगी देख कि बोसे की तमअ रखता हूँ जिन लबों से कि मुयस्सर नहीं दुश्नाम मुझे — Mushafi Ghulam Hamdani
डाल कर ग़ुंचों की मुँदरी शाख़-ए-गुल के कान में अब के होली में बनाना गुल को जोगन ऐ सबा — Mushafi Ghulam Hamdani
मौसम-ए-होली है दिन आए हैं रंग और राग के हम से तुम कुछ माँगने आओ बहाने फाग के — Mushafi Ghulam Hamdani
जी में है इतने बोसे लीजे कि आज महर उस के वहाँ से उठ जावे — Mushafi Ghulam Hamdani
मु-ए-जुज़ 'मीर' जो थे फ़न के उस्ताद यही इक रेख़्ता-गो अब रहा है — Mushafi Ghulam Hamdani
शब जो होली की है मिलने को तिरे मुखड़े से जान चाँद और तारे लिए फिरते हैं अफ़्शाँ हाथ में — Mushafi Ghulam Hamdani

Ghazal

जमुना में कल नहा कर जब उस ने बाल बाँधे हम ने भी अपने दिल में क्या क्या ख़याल बाँधे ऐसा शिकोह उस की सूरत में है कि नागह आवे जो सामने से दस्त-ए-मजाल बाँधे आँखों से गर करे वो ज़ुल्फ़ों को टुक इशारा आवें चले हज़ारों वहशी ग़ज़ाल बाँधे ईसा ओ ख़िज़्र तक भी पहुँचे अजल का मुज़्दा तू तेग़ अगर कमर पर बहर-ए-क़िताल बाँधे लाले की शाख़ हरगिज़ लहके न फिर चमन में गर सर पे सुर्ख़ चीरा वो नौनिहाल बाँधे लत आशिक़ी की कोई जाए है आशिक़ों से गो बादशाह डाँडे गो कोतवाल बाँधे हम किस तरह से देखें जब दे दे पेच लड़ के चीरे के पेचों में तो ज़ुल्फ़ों के बाल बाँधे बंदा हूँ मैं तो उस की आँखों की साहिरी का तार-ए-नज़र से जिस ने साहब-कमाल बाँधे हम एक बोसे के भी ममनूँ नहीं किसी के चाहे सो कोई तोहमत रोज़-ए-विसाल बाँधे सोज़-ए-दिल अपना उस को क्या 'मुसहफ़ी' सुनावें आगो ही वो फिरे है कानों से शाल बाँधे — Mushafi Ghulam Hamdani
अभी अपने मर्तबा-ए-हुस्न से मियाँ बा-ख़बर तू हुआ नहीं कि ग़ज़ल-सरा तिरे बाग़ में कोई मुर्ग़-ए-ताज़ा-नवा नहीं जो गली में यार की जाऊँ हूँ तो अजल कहे है ये रहम खा तू सितम-रसीदा न जा उधर कोई ज़िंदा वाँ से फिरा नहीं वो ग़रीब-ओ-बे-कस-ओ-ज़ार था तुझे उस का देता हूँ मैं पता तिरे कुश्ता का वो मज़ार था कि चराग़ जिस में जला नहीं जो हकीम पास मैं जाऊँ हूँ तो वो दोस्ती से सुनाए है तू मआश की भी तलाश कर ये मक़ाम-ए-फ़क़्र-ओ-फ़ना नहीं मुझे इश्क़ रखता है सर-निगूँ मिरा जाल पूछो न क्या कहूँ मैं हबाब-ए-बहर का शीशा हूँ मिरे टूटने की सदा नहीं तिरे ख़ाकसारों ने अपना सर नहीं पीटा दश्त में इस क़दर कि बगूला वाँ से ग़ुबार का तरफ़ आसमाँ के गया नहीं न नसीम-ए-बाग़-ओ-बहार हूँ न फ़िदा-ए-रू-ए-निगार हूँ मैं ग़रीब-ए-शहर-ओ-दयार हूँ मिरी दैर ओ का'बा में जा नहीं तिरे नख़्ल-ए-हुस्न की कोंपलें अभी ना-शगुफ़्ता हैं ऐ परी जो नसीम आई है उस ने भी इन्हें कुछ समझ के छुआ नहीं तिरे गेसुओं में जो जाती है तो मिरा ही हाल कह आती है मिरी ख़स्म-ए-जाँ भी तो इस क़दर ये नसीम-ए-नाफ़ा-कुशा नहीं न मैं रहने वाला हूँ बाग़ का न सफ़ीर-संज हूँ राग का मुझे ढूँडे है सो वो किस जगह कहीं आशियान-ए-हुमा नहीं कोई ज़ख़्म-ख़ुर्दा है ख़ार का कोई ख़ूँ-तपीदा बहार का है मिरा ही हौसला 'मुसहफ़ी' कि किसी से मुझ को गिला नहीं — Mushafi Ghulam Hamdani