saadgi dekh ki bose ki tam'a rakhta hoon | सादगी देख कि बोसे की तमअ रखता हूँ

  - Mushafi Ghulam Hamdani

सादगी देख कि बोसे की तमअ रखता हूँ
जिन लबों से कि मयस्सर नहीं दुश्नाम मुझे

  - Mushafi Ghulam Hamdani

Lab Shayari

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    उस लब से मिल ही जाएगा बोसा कभी तो हाँ
    शौक़-ए-फ़ुज़ूल ओ जुरअत-ए-रिंदाना चाहिए
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    हम तो उसको देखने आये थे इतनी दूर से
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    उदासी इक समंदर है कि जिसकी तह नहीं है
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    मौसम-ए-होली है दिन आए हैं रंग और राग के
    हम से तुम कुछ माँगने आओ बहाने फाग के
    Mushafi Ghulam Hamdani
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    जमुना में कल नहा कर जब उस ने बाल बाँधे
    हम ने भी अपने दिल में क्या क्या ख़याल बाँधे

    ऐसा शिकोह उस की सूरत में है कि नागह
    आवे जो सामने से दस्त-ए-मजाल बाँधे

    आँखों से गर करे वो ज़ुल्फ़ों को टुक इशारा
    आवें चले हज़ारों वहशी ग़ज़ाल बाँधे

    ईसा ओ ख़िज़्र तक भी पहुँचे अजल का मुज़्दा
    तू तेग़ अगर कमर पर बहर-ए-क़िताल बाँधे

    लाले की शाख़ हरगिज़ लहके न फिर चमन में
    गर सर पे सुर्ख़ चीरा वो नौनिहाल बाँधे

    लत आशिक़ी की कोई जाए है आशिक़ों से
    गो बादशाह डाँडे गो कोतवाल बाँधे

    हम किस तरह से देखें जब दे दे पेच लड़ के
    चीरे के पेचों में तो ज़ुल्फ़ों के बाल बाँधे

    बंदा हूँ मैं तो उस की आँखों की साहिरी का
    तार-ए-नज़र से जिस ने साहब-कमाल बाँधे

    हम एक बोसे के भी ममनूँ नहीं किसी के
    चाहे सो कोई तोहमत रोज़-ए-विसाल बाँधे

    सोज़-ए-दिल अपना उस को क्या 'मुसहफ़ी' सुनावें
    आगो ही वो फिरे है कानों से शाल बाँधे
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    Mushafi Ghulam Hamdani
    जी में है इतने बोसे लीजे कि आज
    महर उस के वहाँ से उठ जावे
    Mushafi Ghulam Hamdani
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    'मुसहफ़ी' फ़ारसी को ताक़ पे रख
    अब है अशआर-ए-हिंदवी का रिवाज
    Mushafi Ghulam Hamdani
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    मु-ए-जुज़ 'मीर' जो थे फ़न के उस्ताद
    यही इक रेख़्ता-गो अब रहा है
    Mushafi Ghulam Hamdani
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