
घर में भी दिल नहीं लग रहा काम पर भी नहीं जा रहा
जाने क्या ख़ौफ़ है जो तुझे चूम कर भी नहीं जा रहा
रात के तीन बजने को है यार ये कैसा महबूब है
जो गले भी नहीं लग रहा और घर भी नहीं जा रहा
— Tehzeeb Hafi
इसी क़लम से और sher
bhai shayari collection के शेर।
उसी अंदाज़ की आवाज़ें
एहसास के अनुसार शायरी