तुझे भी ख़ौफ़ था तेरी मुख़ालिफ़त करूँँगा मैं
और अब नहीं करूँगा तो ग़लत करूँगा मैं
उसे कहो के अहद-ए-तर्क-ए-रस्म-ओ-राह लिख के दे
कलाई काट के लहू से दस्तख़त करूँगा मैं
मेरे लबों ने उस ज़मीं को दाग दार कर दिया
ग़लत नहीं भी हूँ तो उस से माजरत करूँगा मैं
तुझे भी ख़ौफ़ था तेरी मुख़ालिफ़त करूँगा मैं
और अब अगर नहीं करूँगा तो ग़लत करूँगा मैं
— Tehzeeb Hafi















