kuchh is ada se mohabbat-shanaas hona hai | कुछ इस अदा से मोहब्बत-शनास होना है

  - Rahul Jha

कुछ इस अदा से मोहब्बत-शनास होना है
ख़ुशी के बाब में मुझ को उदास होना है

  - Rahul Jha

Andaaz Shayari

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    मुझको ये नज़र आया के वो एक बला है
    कुछ ख़्वाब है कुछ अस्ल है कुछ तर्ज -ए- अदा है

    वो ग़ैर की आगोश में रहने लगा शादाँ
    उसको नहीं मालूम के दिल मेरा जला है
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    Navneet krishna
    है दुआ याद मगर हर्फ़-ए-दुआ याद नहीं
    मेरे नग़्मात को अंदाज़-ए-नवा याद नहीं
    Saghar Siddiqui
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    इक ये भी तो अंदाज़-ए-इलाज-ए-ग़म-ए-जाँ है
    ऐ चारागरो दर्द बढ़ा क्यूँ नहीं देते
    Ahmad Faraz
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    वक़्त, वफ़ा, हक़, आँसू, शिकवे जाने क्या क्या माँग रहे थे
    एक सहूलत के रिश्ते से हम ही ज़्यादा माँग रहे थे

    उसकी आँखे उसकी बातें उसके लब वो चेहरा उसका
    हम उसकी हर एक अदा से अपना हिस्सा माँग रहे थे
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    Shikha Pachouly
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    हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
    कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और
    Mirza Ghalib
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    किस मुँह से कह रहे हो हमें कुछ ग़रज़ नहीं
    किस मुँह से तुम ने वादा किया था निबाह का
    Hafeez Jalandhari
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    मेहंदी लगाए बैठे हैं कुछ इस अदा से वो
    मुट्ठी में उन की दे दे कोई दिल निकाल के
    Riyaz Khairabadi
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    अदा हुआ न क़र्ज़ और वजूद ख़त्म हो गया
    मैं ज़िंदगी का देते देते सूद ख़त्म हो गया
    Faryad Aazar
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    वफ़ा का ज़ोर अगर बाज़ुओं में आ जाये
    चराग़ उड़ता हुआ जुगनुओं में आ जाये

    खिराजे इश्क़, कहीं जा के तब अदा होगा
    हमारा खून अगर आँसुओं में आ जाये
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    Hashim Raza Jalalpuri
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    मैं देर तक तुझे ख़ुद ही न रोकता लेकिन
    तू जिस अदा से उठा है उसी का रोना है
    Firaq Gorakhpuri
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As you were reading Shayari by Rahul Jha

    रंग लाती भी तो किस तौर जबीं-साई मिरी
    जब ख़ुद उस को न थी दरकार शनासाई मिरी

    ये मिरी चीज़ है सो इस का भरोसा है मुझे
    ख़ुद मिरे काम न आएगी मसीहाई मिरी

    उस ने इक बार तो झाँका भी था मुझ में लेकिन
    उस से देखी न गई वुसअत-ए-तन्हाई मिरी

    तुम ये क्या सोच के गुज़री थी मिरे माज़ी से
    तुम ये क्या सोच के शादाबी उठा लाई मिरी

    बहर-ए-पायाब समझ के यहाँ उतरो न अभी
    मेरा दिल ख़ुद भी नहीं जानता गहराई मिरी

    तेरी ख़ुश्बू तिरी तासीर जुदा है मुझ से
    तेरी मिट्टी से न हो पाएगी भरपाई मिरी
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    Rahul Jha
    मैं ख़ाक हूँ सो यही तजरबा रहा है मुझे
    वो शक्ल-ए-नौ के लिए रौंदता रहा है मुझे

    उसे जो चाहिए मैं हूँ उसी के जैसा कोई
    वो मेरे जैसे की ज़िद में गँवा रहा है मुझे

    मैं वो ही ख़्वाब-ए-सहर जो फ़ुज़ूल था दिन-भर
    तवील शब मैं मगर देखा जा रहा है मुझे

    इधर ये फ़र्दा ख़फ़ा है मिरे तग़ाफ़ुल से
    उधर ख़ुलूस से माज़ी बुला रहा है मुझे

    यही नहीं कि मैं ना-मुतमइन हूँ दुनिया से
    मिरा वजूद भी इक मसअला रहा है मुझे
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    Rahul Jha
    ये आशिक़ी तिरे बस की नहीं सो रहने दे
    कि तेरा काम तो बस ना-सिपास होना है
    Rahul Jha
    मुझ को बीमार करेगी तिरी आदत इक दिन
    और फिर तुझ से भी अच्छा नहीं हो पाऊँगा
    Rahul Jha
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    साथ उल्फ़त के मिले थोड़ी सी रुस्वाई भी
    वस्ल के बाद मुझे चाहिए तन्हाई भी

    तंग हो मेरे जुनूँ से कहीं छुप बैठी थी अक़्ल
    और उसे ढूँढने में खो गई दानाई भी

    उम्र जब रूठी तो अपना दिया सब कुछ ले चली
    ज़ोर भी ज़ब्त भी रफ़्तार भी रा'नाई भी

    मैं ने चाहा था कि बिल्कुल ही अकेला हो जाऊँ
    सो गया ग़म गई इशरत गई तन्हाई भी
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    Rahul Jha

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