bas ek dooje ki kamiyon pe vaar karte rahe | बस एक दूजे की कमियों पे वार करते रहे

  - Haider Khan

बस एक दूजे की कमियों पे वार करते रहे
तमाम 'उम्र यही सारे यार करते रहे

यही ख़ता थी गले जो भी मुस्कुरा के मिला
हम अपने यारों में उसका शुमार करते रहे

उदास झील, ख़फ़ा चाँद, इक गुलाब और मैं
तमा'म रात तिरा इंतिज़ार करते रहे

उलझ के रह गए इस एक कश्मकश में हम
वो रोज़ शक्ल नई इख़्तियार करते रहे

छुपा के काँटे दिखाते रहे वो गुल सब को
सो उन की बात पे सब ए'तिबार करते रहे

बस इक गुनाह यही बार बार होता रहा
जो मुंतज़िर था उसे बे-क़रार करते रहे

  - Haider Khan

Crime Shayari

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