Khan Janbaz

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Khan Janbaz shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Khan Janbaz's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
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Sher

उस से कहना था के वो कितना ज़रूरी है मुझे आ रहा हूँ अभी जिस शख़्स से झगड़ा कर के — Khan Janbaz
अल्लाह बना दे मिरे अश्कों को कबूतर सब पूछ रहे हैं तिरे रूमाल में क्या है — Khan Janbaz
इक ज़रा बात पर अपने से पराए हुए लोग हाए वो ख़ून पसीने से कमाए हुए लोग — Khan Janbaz
बच गया है जो तेरा थोड़ा सा हिस्सा मुझ में अब तलक मुझ को किसी का नहीं होने देता — Khan Janbaz

Ghazal

मुझे बनाने में सब का ख़र्चा लगा हुआ है किसी का लोहा किसी का ताँबा लगा हुआ है कभी थी ठंडी ज़मीन साए से जिन के लोगों हमारा ऐसे शजर से शजरा लगा हुआ है नहीं है अपना कोई भी दुनिया जहाँ में लेकिन किसी को खोने का मुझ को ख़दशा लगा हुआ है ये तो खिलौना भी जानता है कि टूटना है अभी खिलौने से एक बच्चा लगा हुआ है वो शोख़ लड़की हसीन चेहरा कमाल बातें सुना है उस का किसी से रिश्ता लगा हुआ है मुझे हमेशा से बैटरी कह के हँसने वाली तुझे ही तकने से मुझ को चश्मा लगा हुआ है किसी की आँखें किसी का दिल इतना कह के 'जाँ-बाज़' वो पूछता है कि तेरा क्या क्या लगा हुआ है — Khan Janbaz
तू सामने है पर तिरी अब भी कमी है दोस्त दरिया के पास होते हुए तिश्नगी है दोस्त दुनिया से जा रहा हूँ किसी की तलब लिए वैसे ये ज़िंदगी बड़ी अच्छी कटी है दोस्त ये फ़लसफ़े लपेट के तुम जेब में रखो मैं ख़ूब जानता हूँ मोहब्बत बुरी है दोस्त अब तो बता कि क्या है ये तेरे ख़याल में जितना मैं जानता हूँ मोहब्बत यही है दोस्त ऐसा नहीं कि आँख में आँसू बचे फ़क़त इन आँसुओं के साथ में इक ख़्वाब भी है दोस्त सच-मुच तो कोई तोड़ के लाता नहीं है चाँद ये शाइ'री है और फ़क़त शाइ'री है दोस्त पाने की ज़िद न कोई बिछड़ने का ख़ौफ़ है अच्छा है तुझ से इश्क़ नहीं दोस्ती है दोस्त — Khan Janbaz
मिन्नतें करता था रुक जाओ मिरा कोई नहीं मेरे रोके से मगर कौन रुका कोई नहीं दोस्त माशूक़ सनम और ख़ुदा कोई नहीं मैं तो सब का हूँ पर अफ़्सोस मिरा कोई नहीं अब तो लाज़िम है कि वो शख़्स मिरा हो जाए अब तो दुनिया में मिरा उस के सिवा कोई नहीं उम्र भर साथ निभाने का ये वा'दा हाए उम्र भर साथ भला कोई रहा कोई नहीं मेरे मौला ये तिरे सात अरब लोगों में कोई भी मेरा नहीं है ब-ख़ुदा कोई नहीं बे-वफ़ाई को बड़ा जुर्म बताने वाले याद है तू ने भी चल छोड़ हटा कोई नहीं मैं भी क़ाइल हूँ तिरी चारागरी का लेकिन इक मरज़ ऐसा भी है जिस की दवा कोई नहीं — Khan Janbaz

Nazm

"तुम्हारा दिन मुबारक हो" न जाने कितने दिन गुज़रे न कोई कॉल न मैसेज न कोई राब्ता रखा तुम्हें मैं याद तो हूँ ना या मुझ को भूल बैठे हो कहाँ अपना हमेशा साथ रहने का इरादा था कि चाहे जो भी हो जाए कभी भी हम न बिछड़ेंगे तुम्हारा भी तो वा'दा था तुम्हें मालूम है कैसे तुम्हारे बिन रहा हूँ मैं मैं शब भर जागता और चाँद से बातें किया करता कहीं जब बात आती थी तुम्हारे हुस्न की तो मैं उलझ पड़ता था उस से भी तुम्हारे हुस्न के हक़ में दलीलें मेरी सुन सुन कर सितारे हँसने लगते थे तुम्हारी वापसी के ख़्वाब मुझ को दिन में आते थे अरे देखो ये मैं भी ना बड़ा पागल हूँ जान-ए-जाँ ये भी क्या वक़्त है कोई शिकायत का चलो छोड़ो हटाओ सब जनम-दिन है तुम्हारा आज कि शिकवे और शिकायत को तो सारी उम्र बाक़ी है तुम्हें ये दिन मुबारक हो तुम्हारा दिन मुबारक हो — Khan Janbaz