Khan Janbaz

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    मिन्नतें करता था रुक जाओ मेरा कोई नहीं
    मेरे रोके से मगर कौन रुका कोई नहीं

    बेवफ़ाई को बड़ा जुर्म बताने वाले
    याद है तूने भी चल छोड़ हटा कोई नहीं
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    अल्लाह बना दे मिरे अश्कों को कबूतर
    सब पूछ रहे हैं तिरे रूमाल में क्या है
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    तू सामने है पर तिरी अब भी कमी है दोस्त
    दरिया के पास होते हुए तिश्नगी है दोस्त

    दुनिया से जा रहा हूँ किसी की तलब लिए
    वैसे ये ज़िंदगी बड़ी अच्छी कटी है दोस्त

    ये फ़लसफ़े लपेट के तुम जेब में रखो
    मैं ख़ूब जानता हूँ मोहब्बत बुरी है दोस्त

    अब तो बता कि क्या है ये तेरे ख़याल में
    जितना मैं जानता हूँ मोहब्बत यही है दोस्त

    ऐसा नहीं कि आँख में आँसू बचे फ़क़त
    इन आँसुओं के साथ में इक ख़्वाब भी है दोस्त

    सच-मुच तो कोई तोड़ के लाता नहीं है चाँद
    ये शाइ'री है और फ़क़त शाइ'री है दोस्त

    पाने की ज़िद न कोई बिछड़ने का ख़ौफ़ है
    अच्छा है तुझ से इश्क़ नहीं दोस्ती है दोस्त
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    मिन्नतें करता था रुक जाओ मिरा कोई नहीं
    मेरे रोके से मगर कौन रुका कोई नहीं

    दोस्त माशूक़ सनम और ख़ुदा कोई नहीं
    मैं तो सब का हूँ पर अफ़्सोस मिरा कोई नहीं

    अब तो लाज़िम है कि वो शख़्स मिरा हो जाए
    अब तो दुनिया में मिरा उस के सिवा कोई नहीं

    उम्र भर साथ निभाने का ये वा'दा हाए
    उम्र भर साथ भला कोई रहा कोई नहीं

    मेरे मौला ये तिरे सात अरब लोगों में
    कोई भी मेरा नहीं है ब-ख़ुदा कोई नहीं

    बेवफ़ाई को बड़ा जुर्म बताने वाले
    याद है तू ने भी चल छोड़ हटा कोई नहीं

    मैं भी क़ाइल हूँ तिरी चारागरी का लेकिन
    इक मरज़ ऐसा भी है जिस की दवा कोई नहीं
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    सय्याद बता तो सही इस जाल में क्या है
    गर दिल नहीं मेरा तो तिरे बाल में क्या है

    वैसे तो ख़ुद इस चाँद का क़ाइल हूँ मैं लेकिन
    इक रौशनी को छोड़ कर इस थाल में क्या है

    मजनूँ ही बता सकता है लैला की फ़ज़ीलत
    या सोहनी से पूछ कि महिवाल में क्या है

    मैं हश्र के मैदान में कह दूँगा मोहब्बत
    पूछेगा ख़ुदा जब तिरे आ'माल में क्या है

    जी करता है उन को तिरी तस्वीर दिखा दूँ
    जो पूछते हैं मुझ से कि बंगाल में क्या है

    अल्लाह बना दे मिरे अश्कों को कबूतर
    सब पूछ रहे हैं तिरे रूमाल में क्या है
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    मैं शक्ल देख के कैसे कहूँ कि क्या होगा
    हसीन शख़्स है मुमकिन है बेवफ़ा होगा

    तुम्हें ख़याल भी आया सफ़र पे जाते हुए
    तुम्हारे बा'द हमारा यहाँ पे क्या होगा

    मैं झूट बोल के आया था वापसी का जिसे
    वो शख़्स अब भी मिरी राह देखता होगा

    ये दोस्ती न कहीं प्यार में बदल जाए
    अब अपने दरमियाँ थोड़ा सा फ़ासला होगा

    ये राज़ मुझ पे खुला अब कि मेरा कोई नहीं
    मैं सोचता था मिरे साथ भी ख़ुदा होगा

    ये शाइ'री का तो ख़ुद शौक़ था उसे 'जाँबाज़'
    हाँ शाइ'रों से कोई मसअला रहा होगा
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    उस से कहना था के वो कितना ज़रूरी है मुझे
    आ रहा हूँ अभी जिस शख़्स से झगड़ा करके
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    इक ज़रा बात पर अपने से पराए हुए लोग
    हाय वो खून पसीने से कमाए हुए लोग
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    इश्क़ भी अपनी ही शर्तों पे किया है मैं ने
    ख़ुद को बेचा नहीं बाज़ार में सस्ता करके

    उस से कहना था के वो कितना ज़रूरी है मुझे
    आ रहा हूँ अभी जिस शख़्स से झगड़ा करके
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    बच गया है जो तेरा थोड़ा सा हिस्सा मुझ में
    अब तलक मुझको किसी का नहीं होने देता
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