mujh se milna ho jise din ke ujaalon mein mile | मुझ से मिलना हो जिसे दिन के उजालों में मिले

  - Haider Khan

मुझ से मिलना हो जिसे दिन के उजालों में मिले
ख़ुद से रहती है मुलाक़ात मिरी शाम के बा'द

  - Haider Khan

Visaal Shayari

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    ये भी मुमकिन है मियाँ आँख भिगोने लग जाऊँ
    वो कहे कैसे हो तुम और मैं रोने लग जाऊँ

    ऐ मेरी आँख में ठहराए हुए वस्ल के ख़्वाब
    मैं तवातुर से तेरे साथ न सोने लग जाऊँ
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    Ejaz Tawakkal Khan
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    बिछड़ के तुझसे न देखा गया किसी का मिलाप
    उड़ा दिए हैं परिंदे शजर पे बैठे हुए
    Adeem Hashmi
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    मैं इसलिए भी तिरे वस्ल से झिझकता हूँ
    कहीं फिर इश्क़ मेरा रायगाँ न हो जाए
    Wajid Husain Sahil
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    जान-लेवा थीं ख़्वाहिशें वर्ना
    वस्ल से इंतिज़ार अच्छा था
    Jaun Elia
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    दिन में मिल लेते कहीं रात ज़रूरी थी क्या?
    बेनतीजा ये मुलाक़ात ज़रूरी थी क्या

    मुझसे कहते तो मैं आँखों में बुला लेता तुम्हें
    भीगने के लिए बरसात ज़रूरी थी क्या
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    Abrar Kashif
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    चले भी आओ भुला कर सभी गिले-शिकवे
    बरसना चाहिए होली के दिन विसाल का रंग
    Azhar Iqbal
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    इक बे-क़रार दिल से मुलाक़ात कीजिए
    जब मिल गए हैं आप तो कुछ बात कीजिए
    Naushad Ali
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    तू दिल पे बोझ ले के मुलाक़ात को न आ
    मिलना है इस तरह तो बिछड़ना क़ुबूल है
    Unknown
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    इस क़दर था खटमलों का चारपाई में हुजूम
    वस्ल का दिल से मिरे अरमान रुख़्सत हो गया
    Akbar Allahabadi
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    आज मिलना था बिछड़ जाने की नीयत से हमें
    आज भी वो देर से पहुँचा है कितना तेज़ है
    Tehzeeb Hafi
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    साँसें हैं, ज़िन्दगी तो है, ज़िंदा-दिली नहीं,
    इस दीप में धुआँ है बस अब, रौशनी नहीं।

    उनकी कहानियों में हमेशा बुरा था मैं,
    मेरी में उन से अच्छा कोई शख़्स ही नहीं।

    अब वक्त ने बदल ली है करवट तो क्या करें,
    वरना वो आश्ना थे कभी, अजनबी नहीं।

    या तो बना के अपना रखो या रिहा करो,
    ये क्या की हमसे इश्क़ कभी है कभी नहीं।

    खोया था इस क़दर मैं ख़यालों में पिछली शब,
    वो आ के जा चुके मुझे एहसास भी नहीं।

    ये तो कहा था उसने कि गौहर हो तुम मगर,
    ये भी कहा था साथ में कि क़ीमती नहीं।

    उनसे बिछड़ते वक्त ये मालूम था मुझे,
    पहला मक़ाम था ये मिरा आख़री नहीं।

    मैं जब गया था उसको मनाने के वास्ते,
    उसने कहा ये हिज्र है नाराज़गी नहीं।

    कुछ लोग टूटते हैं तो सजदों में गिरते हैं,
    हर शख़्स मय-कशी ही करे, लाज़मी नहीं।

    यूँ तो मिरी मज़ार पे आए थे सब मगर,
    जिसके लिए मरे थे हम आया वही नहीं।

    उनसे कल आ रही थी किसी और की महक,
    और वो महक कुछ और ही थी दोस्ती नहीं।

    मेरे बग़ैर ख़ुश थी वो किसने ये कह दिया,
    ऐसा ही था अगर तो वो फिर लौटती नहीं।
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    Haider Khan
    लब पे आता था जो दुआ बन कर
    दिल में रहता है अब ख़ला बन कर

    कितना इतरा रहा है अब वो फूल
    तेरे बालों का मोगरा बन कर
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    Haider Khan
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    बस इक सवाल है फिर कोई और सवाल नहीं
    किसी भी बात का क्या तुम को कुछ मलाल नहीं

    मेरा ज़रा सा भी कुछ उसको अब ख़याल नहीं
    जिसे मैं कहता था उस शख़्स की मिसाल नहीं

    तुम आए भी हो तो अब शहर में बचा क्या है
    वो रंग-ओ-बू वो चमक और वो माह-ओ-साल नहीं

    मैं कर रहा हूँ हक़ीक़त को ख़ुद नज़र-अंदाज़
    ये मेरा ज़र्फ़ है ये आपका कमाल नहीं

    हमीं वो इश्क़ में हारे हुए हैं लोग जिन्हें
    नसीब मौत हो जाती है पर विसाल नहीं

    चलो कि शहर से अब दिल ये भर गया "हैदर"
    यहाँ पे सब है मगर एक हम-ख़याल नहीं
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    Haider Khan
    ख़िज़ाँ का वक्त है ये मौसम-ए-बहार नहीं
    अब आ भी जाओ के इस दिल को अब क़रार नहीं

    नज़र मिला के यही बात मुझसे फिर से कहो
    कि तुमको मेरी मोहब्बत का ए'तिबार नहीं

    अभी भी इसके सहारे गुज़ार सकते हैं
    ये दिल शिकस्ता तो है पर ये सोगवार नहीं

    ज़मीं से वुसअत-ए-आफ़ाक़ तक हमारे सिवा
    सभी तुम्हारे याँ तालिब हैं ग़म-गुसार नहीं

    चराग़ ले के अभी भी खड़े हो राहों में
    और उसके बाद भी कहते हो इंतिज़ार नहीं

    ख़ता थी उसकी पर इल्ज़ाम मेरे सर ही रहा
    वो शख़्स देखो ज़रा सा भी शर्म-सार नहीं

    उसे तो हिज्र के ग़म से भी मिल गई है नजात
    वो मेरे दर्जे का शायद गुनाहगार नहीं
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    Haider Khan
    कहना आसान है कर जाना बहुत मुश्किल है
    इश्क़ में हद से गुज़र जाना बहुत मुश्किल है

    तुम से मिलने मैं जहाँ छोड़ के आ जाऊँ मगर
    तुम को फिर छोड़ के घर जाना बहुत मुश्किल है

    ज़िन्दगी तू ने नज़रिया ही बदल डाला मेरा
    मैं समझता था कि मर जाना बहुत मुश्किल है

    ये गुलिस्ताँ है कई रंग के फूलों का यहाँ
    एक ख़ुशबू का बिखर जाना बहुत मुश्किल है
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    Haider Khan

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