Yasmeen Hameed

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    मैं हमेशा सोचती थी
    आँसू और दर्द
    हमें नफ़रतों से ही मिलते हैं
    अगर नफ़रतें न हों
    तो ये आँसू भी न हों
    और दर्द भी न हो
    मगर जब
    उस की मोहब्बत का
    चाहत का
    और ए'तिबार का मौसम बीता
    तब आँखें खुलीं
    एहसास हुआ
    कि दर्द सिर्फ़ नफ़रतों में ही
    नहीं होता
    मोहब्बत भी इंसान को
    सरापा दर्द बना देती है
    मोहब्बत दर्द देती है
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    Yasmeen Hameed
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    सानेहा क़िस्मतों के दरीचों में लपकेगा छुप जाएगा बात टल जाएगी
    सब मुसाफ़िर घरों को पलट जाएँगे ग़म की वहशत ख़ुशी में बदल जाएगी

    हम सितारों की मानिंद टूटेंगे और आसमाँ पर लकीरें बना जाएँगे
    मौत का रक़्स करती हुई एक साअ'त रुकेगी कहीं फिर सँभल जाएगी

    सारे बिखरे हुए लफ़्ज़ कोई उठा लाएगा आन की आन में और फिर
    उलझी उलझी ज़बाँ अपनी तरतीब बदलेगी और इक कहानी में ढल जाएगी

    एक दिन हम इरादा करेंगे कि अब अपने ख़्वाबों की क़ीमत नहीं लेंगे हम
    एक दिन हम बदल जाएँगे और फिर ख़ुद-बख़ुद सारी दुनिया बदल जाएगी

    जब सितारे बुझेंगे तो शब के समुंदर में लहरों का रुख़ देखने के लिए
    सुब्ह-ए-काज़िब की आँखें अचानक खुलेंगी बशारत की क़िंदील जल जाएगी

    दर्द की लौ की मद्धम हरारत के पहलू में पत्थर का दिल भी तड़ख़ जाएगा
    ये जो लोहे की दीवार अतराफ़-ए-जाँ खींच रखी है ये भी पिघल जाएगी

    ये भी होगा कि दिल ऐसे हो जाएगा जैसे इस में कोई आरज़ू ही न थी
    इतना ख़ाली ये हो जाएगा ख़ाली होने की दिल से ख़लिश भी निकल जाएगी
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    Yasmeen Hameed
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    कोई साया सा लिपट जाता है दिल से आ कर
    खिड़कियाँ खोलनी पड़ती हैं मुझे घबरा कर

    बे-समर पेड़ों की ख़्वाहिश भी अजब ख़्वाहिश है
    बीज बोती हूँ कहीं और से मिट्टी ला कर

    ख़ाक पर फूल जो खिलता है तो मैं सोचती हूँ
    कोई ख़ुश होता था इक रंग मुझे पहना कर

    अपने गहनों में किसी और का चेहरा देखा
    ज़िंदगी मुझ पे हँसी मेरे ही घर में आ कर

    जैसे दुनिया से बहुत दूर चली आई हूँ
    मुतमइन रहती हूँ इक झूट से जी बहला कर
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    Yasmeen Hameed
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    ये दुनिया दूर तक का सिलसिला नईं
    हमें उस के लिए कुछ सोचना नईं

    ये पुतला इस क़दर मग़रूर क्यूँ है
    तो क्या ये आसमानों से गिरा नईं

    बहुत पहले ये दिन आने से पहले
    जो होना था अभी तक भी हुआ नईं

    सभी हक़ फ़ैसले के मुंतज़िर हैं
    किसी ने ख़ून का बदला लिया नईं

    अभी सूरज में थोड़ी रौशनी है
    ज़मीं का रंग भी फीका पड़ा नईं

    दर-ओ-दीवार के मे'मार देखें
    ये घर बुनियाद से अब भी हिला नईं

    ये रस्ता शहर के नक़्शे में होगा
    ये रस्ता सिर्फ़ आँखों में खुला नईं

    ये दुनिया इस लिए आधी है अब तक
    पियाला दर्द से पूरा भरा नईं

    वही आँखें वही चेहरा वही बात
    किसी तस्वीर में कुछ भी नया नईं

    हमें कुछ काम करने हैं यहाँ पर
    ये माना काम का कोई सिला नईं

    उसी के मशवरे को मानते हैं
    ये दिल जैसा भी है उतना बुरा नईं

    बदन की ख़ाक पर छींटे लहू के
    कहाँ से आए हैं हम ने कहा नईं

    मुसलसल रोने वाले हँस रहे हैं
    ये कोई छोटा-मोटा वाक़िआ' नईं

    किसी के दुख का चर्चा हो रहा है
    कोई दुख ऐसे दुख से तो सिवा नईं

    ये बात इक रोज़ दुनिया मान लेगी
    हमारे जुर्म की कोई सज़ा नईं

    कोई सोता नहीं है क्या सर-ए-शाम
    कोई भी मुँह अंधेरे जागता नईं

    नहीं मालूम उन को याद है क्या
    हमें तो एक दिन भी भूलता नईं

    भुला हो गर कोई समझाए उन को
    नमक-पाशी में तासीर-ए-शिफ़ा नईं

    कहाँ पर कौन था जो अब नहीं है
    किसी से पूछने का हौसला नईं

    किसी का सोचना रुक रुक के चलना
    मुनासिब था मगर अच्छा लगा नईं

    कोई तस्लीम करता ही नहीं कुछ
    अभी शायद कोई इतना बड़ा नईं

    हमें जैसे कोई ज़िद हो गई थी
    जो दुनिया ने कहा हम ने किया नईं

    ख़ुद अपने वास्ते मुश्किल हुए जब
    हमें आसान फिर कुछ भी मिला नईं

    लिबास-ओ-वज़ा शायद एक से हों
    मगर अंदर से कोई एक सा नईं

    अभी तो ज़ेहन सैक़ल हो रहा है
    जो लिखना है अभी हम ने लिखा नईं

    अभी टुकड़े इकट्ठे हो रहे हैं
    अभी टूटा हुआ रिश्ता जुड़ा नईं

    ये मंज़र इस जगह पहले नहीं था
    तो क्या है फिर अगर ये मो'जिज़ा नईं

    नई बस्ती में आबादी बहुत है
    मगर कोई किसी को जानता नईं

    हम इक तन्हा सदी के पेश-रौ हैं
    हमारा ऐसा-वैसा मर्तबा नईं

    शजर फूटेगा फिर इक दिन ज़मीं से
    है दा'वा ज़िंदगी का मौत का नईं

    ख़ुदा से राब्ता कर के तो देखो
    फिर उस के बा'द कह देना ख़ुदा नईं

    चहार-अतराफ़ ऐसी थी चका-चौंद
    किसी की आँख से पर्दा हटा नईं

    ये लगता है मगर ये सच नहीं है
    कि पूरी बात कोई जानता नईं

    यही तूफ़ान भी बरपा करेंगे
    हमारे दोस्त पानी और हवा नईं

    इसी मिट्टी में मिट्टी हो रहेंगे
    इसी मिट्टी को कोई पूछता नईं

    उठी शो'लों से बच्चे खेलते थे
    लगी फिर आग तो कुछ भी बचा नईं

    अनासिर हुक्म की तामील में हैं
    दुआ की दस्तरस से मावरा नईं

    अगर मुबहम रहा इंसान तो क्या
    यहाँ तो आसमानों का सिरा नईं

    है मुश्किल ख़ौफ़ को तस्ख़ीर करना
    समुंदर पार करना मरहला नईं

    वहाँ के फूल चुनना चाहते हैं
    हमारा जिस ज़मीं से राब्ता नईं

    उसी के ध्यान में उलझे हुए हैं
    हमें जो आँख उठा के देखता नईं

    हमें अपनी ख़बर बस इस क़दर है
    कि अगली साँस तक का भी पता नईं

    न जाने क्या है फिर जो माँगता है
    ये दिल कुछ भी तो उस से माँगता नईं

    तमाम आसूदगी आसूदगी बस
    मगर ऐसे भी जीने का मज़ा नईं

    बराबर इज़्तिराब और बे-यक़ीनी
    बहुत बढ़ जाए तो ये भी भला नईं

    तो फिर हम किस तरह से ख़ुश रहेंगे
    मगर ख़ुश इस तरह कोई रहा नईं

    ये सब बे-कार की बातें हैं शायद
    हमारा अस्ल में ये मसअला नईं

    ये वो क्या तोड़ते हैं जोड़ते हैं
    न जाने क्या है जो अब तक बना नईं

    ग़ुबार-ए-वक़्त हैं पर मानते हैं
    क़ुसूर इस में ज़रा भी वक़्त का नईं

    बताना सोच कर ता'बीर इस की
    मुअब्बिर ये इशारा रात का नईं

    हमारी साँस उखड़ जाए तो क्या है
    यही तो ज़िंदगी की इंतिहा नईं

    ज़बाँ छालों से भर जाए तो क्या है
    कभी मुँह से हमें कुछ भूलना नईं

    अधूरी बात रह जाए तो क्या है
    अधूरी बात को भी क्या बक़ा नईं

    न आनी थी न आई दुनिया-दारी
    मगर शर्मिंदगी उस की ज़रा नईं

    बहुत ही दूर से आवाज़ आई
    हमें ऐसे लगा हम ने सुना नईं

    कभी लगता है हम वैसे नहीं हैं
    कभी लगता है हम उस से जुदा नईं

    जो ज़ाहिर था उसे तो क्या छुपाते
    छुपाना चाहते थे जो छुपा नईं

    मुसाफ़िर थोड़ी मोहलत है तिरे पास
    सफ़ीना इतनी जल्दी डूबता नईं

    बहुत कुछ है जो पानी पे लिखा है
    किसी ने आज तक भी जो पढ़ा नईं

    किसी की मौत का मतलब फ़ना है
    किसी की मौत का मतलब फ़ना नईं
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    Yasmeen Hameed
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    क्या हुआ कोई सोचता भी नहीं
    और कहने को कुछ हुआ भी नहीं

    जैसे गुम हो गई शनाख़्त मिरी
    अब कोई मुझ को ढूँढता भी नहीं

    जिस से रहने लगे गिले मुझ को
    वो अभी मुझ को जानता भी नहीं

    ऐसा ख़ामोश भी नहीं लगता
    और कुछ मुँह से बोलता भी नहीं

    चाहता है जवाब भी सारे
    और कुछ मुझ से पूछता भी नहीं

    मुस्तरद भी कभी नहीं करता
    वो मिरी बात मानता भी नहीं

    दाद देता है जीतने पे मुझे
    और कभी मुझ से हारता भी नहीं

    ख़्वाब तक मेरे छीन लेता है
    और कुछ मुझ से माँगता भी नहीं

    उस तरफ़ सब चराग़ जलते हैं
    जिस तरफ़ कोई रास्ता भी नहीं

    रात दिन पर मुहीत है तो रहे
    रौशनी कोई चाहता भी नहीं

    डूबते आफ़्ताब की जानिब
    देर तक कोई देखता भी नहीं
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    Yasmeen Hameed
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    ख़लिश है ख़्वाब है आधी कहानी है
    हमारी बात तो बस आनी जानी है

    समुंदर से तुम्हें वहशत है क्यों इतनी
    इसे छू कर तो देखो सिर्फ़ पानी है

    मैं कुछ भी पूछ लूँ क्या फ़र्क़ पड़ता है
    तुम्हें तो बात ही कोई बनानी है

    ज़रा बतलाओ तुम किस किस से मिलते हो
    तुम्हारे शहर में कितनी गिरानी है

    तुम्हें दुनिया से मतलब है मुझे तुम से
    तो फिर ये किस तरह की हम-ज़बानी है

    हम इस पहलू से भी तो सोच सकते हैं
    सितारा रात की पहली निशानी है

    ज़मीं को आते जाते मौसमों से क्या
    उसे तो आग मिट्टी से बुझानी है

    सभी हैं सुर्ख़-रू अपनी अदालत में
    किसी ने कब किसी की बात मानी है
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    Yasmeen Hameed
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    उफ़ुक़ तक मेरा सहरा खिल रहा है
    कहीं दरिया से दरिया मिल रहा है

    लिबास-ए-अब्र ने भी रंग बदला
    ज़मीं का पैरहन भी सिल रहा है

    इसी तख़्लीक़ की आसूदगी में
    बहुत बेचैन मेरा दिल रहा है

    किसी के नर्म लहजे का क़रीना
    मिरी आवाज़ में शामिल रहा है

    मैं अब उस हर्फ़ से कतरा रही हूँ
    जो मेरी बात का हासिल रहा है

    किसी के दिल की ना-हमवारियों पर
    सँभलना किस क़दर मुश्किल रहा है
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    Yasmeen Hameed
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    दौलत-ए-दर्द समेटो कि बिखरने को है
    रात का आख़िरी लम्हा भी गुज़रने को है

    ख़िश्त-दर-ख़िश्त अक़ीदत ने बनाया जिस को
    अब्र-ए-आज़ार उसी घर पे ठहरने को है

    किश्त-ए-बर्बाद से तजदीद-ए-वफ़ा कर देखो
    अब तो दरियाओं का पानी भी उतरने को है

    अपनी आँखों में वही अक्स लिए फिरते हैं
    जैसे आईना-ए-मक़्सूम सँवरने को है

    जो डुबोएगी न पहुँचाएगी साहिल पे हमें
    अब वही मौज समुंदर से उभरने को है

    कुंज-ए-तन्हाई में खिलता है तख़य्युल मेरा
    और मैं ख़ुश हूँ कि ये गुल फिर से निखरने को है
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    इक बे-पनाह रात का तन्हा जवाब था
    छोटा सा इक दिया जो सर-ए-एहतिसाब था

    रस्ता मिरा तज़ाद की तस्वीर हो गया
    दरिया भी बह रहा था जहाँ पर सराब था

    वो वक़्त भी अजीब था हैरान कर गया
    वाज़ेह था ज़िंदगी की तरह और ख़्वाब था

    पहले पड़ाव से ही उसे लौटना पड़ा
    लम्बी मसाफ़तों से जिसे इज्तिनाब था

    फिर बे-नुमू ज़मीन थी और ख़ुश्क थे शजर
    बे-अब्र आसमाँ का चलन कामयाब था

    इक बे-क़यास बात से मंसूब हो गया
    फैला हुआ हुरूफ़ में जो इज़्तिराब था

    अपनी निगाह पर भी करूँ ए'तिबार क्या
    किस मान पर कहूँ वो मिरा इंतिख़ाब था
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    Yasmeen Hameed
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    पर्दा आँखों से हटाने में बहुत देर लगी
    हमें दुनिया नज़र आने में बहुत देर लगी

    नज़र आता है जो वैसा नहीं होता कोई शख़्स
    ख़ुद को ये बात बताने में बहुत देर लगी

    एक दीवार उठाई थी बड़ी उजलत में
    वही दीवार गिराने में बहुत देर लगी

    आग ही आग थी और लोग बहुत चारों तरफ़
    अपना तो ध्यान ही आने में बहुत देर लगी

    जिस तरह हम कभी होना ही नहीं चाहते थे
    ख़ुद को फिर वैसा बनाने में बहुत देर लगी

    ये हुआ तू कि हर इक शय की कशिश माँद पड़ी
    मगर इस मोड़ पे आने में बहुत देर लगी
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    Yasmeen Hameed
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