बिखर गया
    हवा के थपेड़े से
    घोंसला
    मिलाऊँगा कैसे नज़र
    लूट कर आई अगर
    चिड़िया
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    Aadil Raza Mansoori
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    पलट कर देख भर सकती हैं
    भेड़ें
    बोलना चाहें भी तो बोलेंगी कैसे
    हो चुकी हैं सल्ब आवाज़ें कभी की
    लौटना मुमकिन नहीं है
    सिर्फ़ चलना और चलते रहना है
    ख़्वाबों के ग़ार की जानिब
    जिस का रस्ता
    सुनहरे भेड़ियों के दाँतों से हो कर गुज़रता है
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    Aadil Raza Mansoori
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    हर रोज़
    बदल जाता है कुछ न कुछ
    कमरा
    हर हफ़्ते अशरे में
    नए सलीक़े से सजाया जाता है
    सामान
    वक़्त के साथ
    बदल जाती हैं
    कुछ चीज़ें भी
    मगर
    एक साथ
    सब कुछ
    बदलने के लिए
    बदलना होता है
    घर
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    Aadil Raza Mansoori
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    इस के हरे रहने
    सूखने
    झड़ने से
    फ़र्क़ कुछ पड़ता नहीं है
    पेड़ को
    क्या इसी ग़म में
    घुल जाता है
    पत्ता
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    Aadil Raza Mansoori
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    लटका दिया
    दिन
    खूँटी पर
    हैंगर से उतारी
    रात
    पहनने के लिए
    दिन और रात
    हो गए कितने पुराने
    अगले सफ़र के लिए
    मुनासिब होगा
    कौन सा
    लिबास
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    Aadil Raza Mansoori
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    सफ़र के ब'अद भी मुझ को सफ़र में रहना है
    नज़र से गिरना भी गोया ख़बर में रहना है
    Aadil Raza Mansoori
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    दिन के सीने पे शाम का पत्थर
    एक पत्थर पे दूसरा पत्थर

    ये सुना था कि देवता है वो
    मेरे हक़ ही में क्यूँ हुआ पथर

    दाएरे बनते और मिटते थे
    झील में जब कभी गिरा पत्थर

    अब तो आबाद है वहाँ बस्ती
    अब कहाँ तेरे नाम का पत्थर

    हो गए मंज़िलों के सब राही
    दे रहा है किसे सदा पत्थर

    सारे तारे ज़मीं पे गिर जाते
    ज़ोर से मैं जो फेंकता पत्थर

    नाम ने काम कर दिखाया है
    सब ने देखा है तैरता पत्थर

    तू उसे क्या उठाएगा 'आदिल'
    'मीर' तक से न उठ सका पत्थर
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    Aadil Raza Mansoori
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    रास्ते सिखाते हैं किस से क्या अलग रखना
    मंज़िलें अलग रखना क़ाफ़िला अलग रखना

    बअ'द एक मुद्दत के लौट कर वो आया है
    आज तो कहानी से हादिसा अलग रखना

    जिस से हम ने सीखा था साथ साथ चलना है
    अब वही बताता है नक़्श-ए-पा अलग रखना

    कूज़ा-गर ने जाने क्यूँ आदमी बनाया है
    उस को सब खिलौनों से तुम ज़रा अलग रखना

    लौट कर तो आए हो तजरबों की सूरत है
    पर मिरी कहानी से फ़ल्सफ़ा अलग रखना

    तुम तो ख़ूब वाक़िफ़ हो अब तुम्ही बताओ ना
    किस में क्या मिलाना है किस से क्या अलग रखना

    ख़्वाहिशों का ख़म्याज़ा ख़्वाब क्यूँ भरें 'आदिल'
    आज मेरी आँखों से रत-जगा अलग रखना
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    Aadil Raza Mansoori
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    सफ़र के बाद भी मुझ को सफ़र में रहना है
    नज़र से गिरना भी गोया ख़बर में रहना है

    अभी से ओस को किरनों से पी रहे हो तुम
    तुम्हें तो ख़्वाब सा आंखों के घर में रहना है

    हवा तो आप की क़िस्मत में होना लिक्खा था
    मगर मैं आग हूं मुझ को शजर में रहना है

    निकल के ख़ुद से जो ख़ुद ही में डूब जाता है
    मैं वो सफ़ीना हूं जिस को भंवर में रहना है

    तुम्हारे बाद कोई रास्ता नहीं मिलता
    तो तय हुआ कि उदासी के घर में रहना है

    जला के कौन मुझे अब चले किसी की तरफ़
    बुझे दिए को तो 'आदिल' खंडर में रहना है
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    Aadil Raza Mansoori
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    मिरी ख़ामोशियों की झील में फिर
    किसी आवाज़ का पत्थर गिरा है
    Aadil Raza Mansoori
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