Dagh Dehlvi

Top 10 of Dagh Dehlvi

    सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं
    हम देखने वालों की नज़र देख रहे हैं

    तेवर तिरे ऐ रश्क-ए-क़मर देख रहे हैं
    हम शाम से आसार-ए-सहर देख रहे हैं

    मेरा दिल-ए-गुम-गश्ता जो ढूँडा नहीं मिलता
    वो अपना दहन अपनी कमर देख रहे हैं

    कोई तो निकल आएगा सरबाज़-ए-मोहब्बत
    दिल देख रहे हैं वो जिगर देख रहे हैं

    है मजमा-ए-अग़्यार कि हंगामा-ए-महशर
    क्या सैर मिरे दीदा-ए-तर देख रहे हैं

    अब ऐ निगह-ए-शौक़ न रह जाए तमन्ना
    इस वक़्त उधर से वो इधर देख रहे हैं

    हर-चंद कि हर रोज़ की रंजिश है क़यामत
    हम कोई दिन उस को भी मगर देख रहे हैं

    आमद है किसी की कि गया कोई इधर से
    क्यूँ सब तरफ़-ए-राहगुज़र देख रहे हैं

    तकरार तजल्ली ने तिरे जल्वे में क्यूँ की
    हैरत-ज़दा सब अहल-ए-नज़र देख रहे हैं

    नैरंग है एक एक तिरा दीद के क़ाबिल
    हम ऐ फ़लक-ए-शोबदा-गर देख रहे हैं

    कब तक है तुम्हारा सुख़न-ए-तल्ख़ गवारा
    इस ज़हर में कितना है असर देख रहे हैं

    कुछ देख रहे हैं दिल-ए-बिस्मिल का तड़पना
    कुछ ग़ौर से क़ातिल का हुनर देख रहे हैं

    अब तक तो जो क़िस्मत ने दिखाया वही देखा
    आइंदा हो क्या नफ़ा ओ ज़रर देख रहे हैं

    पहले तो सुना करते थे आशिक़ की मुसीबत
    अब आँख से वो आठ पहर देख रहे हैं

    क्यूँ कुफ़्र है दीदार-ए-सनम हज़रत-ए-वाइज़
    अल्लाह दिखाता है बशर देख रहे हैं

    ख़त ग़ैर का पढ़ते थे जो टोका तो वो बोले
    अख़बार का परचा है ख़बर देख रहे हैं

    पढ़ पढ़ के वो दम करते हैं कुछ हाथ पर अपने
    हँस हँस के मिरे ज़ख़्म-ए-जिगर देख रहे हैं

    मैं 'दाग़' हूँ मरता हूँ इधर देखिए मुझ को
    मुँह फेर के ये आप किधर देख रहे हैं

    Dagh Dehlvi
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    मिलाते हो उसी को ख़ाक में जो दिल से मिलता है
    मिरी जाँ चाहने वाला बड़ी मुश्किल से मिलता है

    कहीं है ईद की शादी कहीं मातम है मक़्तल में
    कोई क़ातिल से मिलता है कोई बिस्मिल से मिलता है

    पस-ए-पर्दा भी लैला हाथ रख लेती है आँखों पर
    ग़ुबार-ए-ना-तवान-ए-क़ैस जब महमिल से मिलता है

    भरे हैं तुझ में वो लाखों हुनर ऐ मजमा-ए-ख़ूबी
    मुलाक़ाती तिरा गोया भरी महफ़िल से मिलता है

    मुझे आता है क्या क्या रश्क वक़्त-ए-ज़ब्ह उस से भी
    गला जिस दम लिपट कर ख़ंजर-ए-क़ातिल से मिलता है

    ब-ज़ाहिर बा-अदब यूँ हज़रत-ए-नासेह से मिलता हूँ
    मुरीद-ए-ख़ास जैसे मुर्शिद-ए-कामिल से मिलता है

    मिसाल-ए-गंज-ए-क़ारूँ अहल-ए-हाजत से नहीं छुपता
    जो होता है सख़ी ख़ुद ढूँड कर साइल से मिलता है

    जवाब इस बात का उस शोख़ को क्या दे सके कोई
    जो दिल ले कर कहे कम-बख़्त तू किस दिल से मिलता है

    छुपाए से कोई छुपती है अपने दिल की बेताबी
    कि हर तार-ए-नफ़स अपना रग-ए-बिस्मिल से मिलता है

    अदम की जो हक़ीक़त है वो पूछो अहल-ए-हस्ती से
    मुसाफ़िर को तो मंज़िल का पता मंज़िल से मिलता है

    ग़ज़ब है 'दाग़' के दिल से तुम्हारा दिल नहीं मिलता
    तुम्हारा चाँद सा चेहरा मह-ए-कामिल से मिलता है

    Dagh Dehlvi
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    अभी हमारी मोहब्बत किसी को क्या मालूम
    किसी के दिल की हक़ीक़त किसी को क्या मालूम

    यक़ीं तो ये है वो ख़त का जवाब लिक्खेंगे
    मगर नविश्ता-ए-क़िस्मत किसी को क्या मालूम

    ब-ज़ाहिर उन को हया-दार लोग समझे हैं
    हया में जो है शरारत किसी को क्या मालूम

    क़दम क़दम पे तुम्हारे हमारे दिल की तरह
    बसी हुई है क़यामत किसी को क्या मालूम

    ये रंज ओ ऐश हुए हिज्र ओ वस्ल में हम को
    कहाँ है दोज़ख़ ओ जन्नत किसी को क्या मालूम

    जो सख़्त बात सुने दिल तो टूट जाता है
    इस आईने की नज़ाकत किसी को क्या मालूम

    किया करें वो सुनाने को प्यार की बातें
    उन्हें है मुझ से अदावत किसी को क्या मालूम

    ख़ुदा करे न फँसे दाम-ए-इश्क़ में कोई
    उठाई है जो मुसीबत किसी को क्या मालूम

    अभी तो फ़ित्ने ही बरपा किए हैं आलम में
    उठाएँगे वो क़यामत किसी को क्या मालूम

    जनाब-ए-'दाग़' के मशरब को हम से तो पूछो
    छुपे हुए हैं ये हज़रत किसी को क्या मालूम

    Dagh Dehlvi
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    ना-रवा कहिए ना-सज़ा कहिए
    कहिए कहिए मुझे बुरा कहिए

    तुझ को बद-अहद ओ बेवफ़ा कहिए
    ऐसे झूटे को और क्या कहिए

    दर्द दिल का न कहिए या कहिए
    जब वो पूछे मिज़ाज क्या कहिए

    फिर न रुकिए जो मुद्दआ कहिए
    एक के बा'द दूसरा कहिए

    आप अब मेरा मुँह न खुलवाएँ
    ये न कहिए कि मुद्दआ कहिए

    वो मुझे क़त्ल कर के कहते हैं
    मानता ही न था ये क्या कहिए

    दिल में रखने की बात है ग़म-ए-इश्क़
    इस को हरगिज़ न बरमला कहिए

    तुझ को अच्छा कहा है किस किस ने
    कहने वालों को और क्या कहिए

    वो भी सुन लेंगे ये कभी न कभी
    हाल-ए-दिल सब से जा-ब-जा कहिए

    मुझ को कहिए बुरा न ग़ैर के साथ
    जो हो कहना जुदा जुदा कहिए

    इंतिहा इश्क़ की ख़ुदा जाने
    दम-ए-आख़िर को इब्तिदा कहिए

    मेरे मतलब से क्या ग़रज़ मतलब
    आप अपना तो मुद्दआ कहिए

    ऐसी कश्ती का डूबना अच्छा
    कि जो दुश्मन को नाख़ुदा कहिए

    सब्र फ़ुर्क़त में आ ही जाता है
    पर उसे देर-आश्ना कहिए

    आ गई आप को मसीहाई
    मरने वालों को मर्हबा कहिए

    आप का ख़ैर-ख़्वाह मेरे सिवा
    है कोई और दूसरा कहिए

    हाथ रख कर वो अपने कानों पर
    मुझ से कहते हैं माजरा कहिए

    होश जाते रहे रक़ीबों के
    'दाग़' को और बा-वफ़ा कहिए

    Dagh Dehlvi
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    ले चला जान मिरी रूठ के जाना तेरा
    ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा

    अपने दिल को भी बताऊँ न ठिकाना तेरा
    सब ने जाना जो पता एक ने जाना तेरा

    तू जो ऐ ज़ुल्फ़ परेशान रहा करती है
    किस के उजड़े हुए दिल में है ठिकाना तेरा

    आरज़ू ही न रही सुब्ह-ए-वतन की मुझ को
    शाम-ए-ग़ुर्बत है अजब वक़्त सुहाना तेरा

    ये समझ कर तुझे ऐ मौत लगा रक्खा है
    काम आता है बुरे वक़्त में आना तेरा

    ऐ दिल-ए-शेफ़्ता में आग लगाने वाले
    रंग लाया है ये लाखे का जमाना तेरा

    तू ख़ुदा तो नहीं ऐ नासेह-ए-नादाँ मेरा
    क्या ख़ता की जो कहा मैं ने न माना तेरा

    रंज क्या वस्ल-ए-अदू का जो तअ'ल्लुक़ ही नहीं
    मुझ को वल्लाह हँसाता है रुलाना तेरा

    काबा ओ दैर में या चश्म-ओ-दिल-ए-आशिक़ में
    इन्हीं दो-चार घरों में है ठिकाना तेरा

    तर्क-ए-आदत से मुझे नींद नहीं आने की
    कहीं नीचा न हो ऐ गोर सिरहाना तेरा

    मैं जो कहता हूँ उठाए हैं बहुत रंज-ए-फ़िराक़
    वो ये कहते हैं बड़ा दिल है तवाना तेरा

    बज़्म-ए-दुश्मन से तुझे कौन उठा सकता है
    इक क़यामत का उठाना है उठाना तेरा

    अपनी आँखों में अभी कौंद गई बिजली सी
    हम न समझे कि ये आना है कि जाना तेरा

    यूँ तो क्या आएगा तू फ़र्त-ए-नज़ाकत से यहाँ
    सख़्त दुश्वार है धोके में भी आना तेरा

    'दाग़' को यूँ वो मिटाते हैं ये फ़रमाते हैं
    तू बदल डाल हुआ नाम पुराना तेरा

    Dagh Dehlvi
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    उज़्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं
    बाइस-ए-तर्क-ए-मुलाक़ात बताते भी नहीं

    मुंतज़िर हैं दम-ए-रुख़्सत कि ये मर जाए तो जाएँ
    फिर ये एहसान कि हम छोड़ के जाते भी नहीं

    सर उठाओ तो सही आँख मिलाओ तो सही
    नश्शा-ए-मय भी नहीं नींद के माते भी नहीं

    क्या कहा फिर तो कहो हम नहीं सुनते तेरी
    नहीं सुनते तो हम ऐसों को सुनाते भी नहीं

    ख़ूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं
    साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं

    मुझ से लाग़र तिरी आँखों में खटकते तो रहे
    तुझ से नाज़ुक मिरी नज़रों में समाते भी नहीं

    देखते ही मुझे महफ़िल में ये इरशाद हुआ
    कौन बैठा है उसे लोग उठाते भी नहीं

    हो चुका क़त्अ तअ'ल्लुक़ तो जफ़ाएँ क्यूँ हों
    जिन को मतलब नहीं रहता वो सताते भी नहीं

    ज़ीस्त से तंग हो ऐ 'दाग़' तो जीते क्यूँ हो
    जान प्यारी भी नहीं जान से जाते भी नहीं

    Dagh Dehlvi
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    हज़ारों काम मोहब्बत में हैं मज़े के 'दाग़'
    जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं

    Dagh Dehlvi
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    अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता
    कभी जान सदक़े होती कभी दिल निसार होता

    कोई फ़ित्ना ता-क़यामत न फिर आश्कार होता
    तिरे दिल पे काश ज़ालिम मुझे इख़्तियार होता

    जो तुम्हारी तरह तुम से कोई झूटे वादे करता
    तुम्हीं मुंसिफ़ी से कह दो तुम्हें ए'तिबार होता

    ग़म-ए-इश्क़ में मज़ा था जो उसे समझ के खाते
    ये वो ज़हर है कि आख़िर मय-ए-ख़ुश-गवार होता

    ये मज़ा था दिल-लगी का कि बराबर आग लगती
    न तुझे क़रार होता न मुझे क़रार होता

    न मज़ा है दुश्मनी में न है लुत्फ़ दोस्ती में
    कोई ग़ैर ग़ैर होता कोई यार यार होता

    तिरे वादे पर सितमगर अभी और सब्र करते
    अगर अपनी ज़िंदगी का हमें ए'तिबार होता

    ये वो दर्द-ए-दिल नहीं है कि हो चारासाज़ कोई
    अगर एक बार मिटता तो हज़ार बार होता

    गए होश तेरे ज़ाहिद जो वो चश्म-ए-मस्त देखी
    मुझे क्या उलट न देते जो न बादा-ख़्वार होता

    मुझे मानते सब ऐसा कि अदू भी सज्दे करते
    दर-ए-यार काबा बनता जो मिरा मज़ार होता

    तुम्हें नाज़ हो न क्यूँकर कि लिया है 'दाग़' का दिल
    ये रक़म न हाथ लगती न ये इफ़्तिख़ार होता

    Dagh Dehlvi
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    तुम्हारा दिल मिरे दिल के बराबर हो नहीं सकता
    वो शीशा हो नहीं सकता ये पत्थर हो नहीं सकता

    Dagh Dehlvi
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    वो क़त्ल कर के मुझे हर किसी से पूछते हैं
    ये काम किसने किया है, ये काम किस का था?

    Dagh Dehlvi
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