hazaaron kaam mohabbat mein hain maze ke daagh | हज़ारों काम मोहब्बत में हैं मज़े के 'दाग़'

  - Dagh Dehlvi

हज़ारों काम मोहब्बत में हैं मज़े के 'दाग़'
जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं

  - Dagh Dehlvi

Aadmi Shayari

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    कहने देती नहीं कुछ मुँह से मोहब्बत मेरी
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    Dagh Dehlvi
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    फिरे राह से वो यहाँ आते आते
    अजल मर रही तू कहाँ आते आते

    न जाना कि दुनिया से जाता है कोई
    बहुत देर की मेहरबाँ आते आते

    सुना है कि आता है सर नामा-बर का
    कहाँ रह गया अरमुग़ाँ आते आते

    यक़ीं है कि हो जाए आख़िर को सच्ची
    मिरे मुँह में तेरी ज़बाँ आते आते

    सुनाने के क़ाबिल जो थी बात उन को
    वही रह गई दरमियाँ आते आते

    मुझे याद करने से ये मुद्दआ था
    निकल जाए दम हिचकियाँ आते आते

    अभी सिन ही क्या है जो बेबाकियाँ हों
    उन्हें आएँगी शोख़ियाँ आते आते

    कलेजा मिरे मुँह को आएगा इक दिन
    यूँही लब पर आह-ओ-फ़ुग़ाँ आते आते

    चले आते हैं दिल में अरमान लाखों
    मकाँ भर गया मेहमाँ आते आते

    नतीजा न निकला थके सब पयामी
    वहाँ जाते जाते यहाँ आते आते

    तुम्हारा ही मुश्ताक़-ए-दीदार होगा
    गया जान से इक जवाँ आते आते

    तिरी आँख फिरते ही कैसा फिरा है
    मिरी राह पर आसमाँ आते आते

    पड़ा है बड़ा पेच फिर दिल-लगी में
    तबीअत रुकी है जहाँ आते आते

    मिरे आशियाँ के तो थे चार तिनके
    चमन उड़ गया आँधियाँ आते आते

    किसी ने कुछ उन को उभारा तो होता
    न आते न आते यहाँ आते आते

    क़यामत भी आती थी हमराह उस के
    मगर रह गई हम-इनाँ आते आते

    बना है हमेशा ये दिल बाग़ ओ सहरा
    बहार आते आते ख़िज़ाँ आते आते

    नहीं खेल ऐ 'दाग़' यारों से कह दो
    कि आती है उर्दू ज़बाँ आते आते
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    Dagh Dehlvi
    तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं
    तुझे हर बहाने से हम देखते हैं

    हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं
    वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं

    ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं
    हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं

    फिरे बुत-कदे से तो ऐ अहल-ए-काबा
    फिर आ कर तुम्हारे क़दम देखते हैं

    हमें चश्म-ए-बीना दिखाती है सब कुछ
    वो अंधे हैं जो जाम-ए-जम देखते हैं

    न ईमा-ए-ख़्वाहिश न इज़हार-ए-मतलब
    मिरे मुँह को अहल-ए-करम देखते हैं

    कभी तोड़ते हैं वो ख़ंजर को अपने
    कभी नब्ज़-ए-बिस्मिल में दम देखते हैं

    ग़नीमत है चश्म-ए-तग़ाफ़ुल भी उन की
    बहुत देखते हैं जो कम देखते हैं

    ग़रज़ क्या कि समझें मिरे ख़त का मज़मूँ
    वो उनवान ओ तर्ज़-ए-रक़म देखते हैं

    सलामत रहे दिल बुरा है कि अच्छा
    हज़ारों में ये एक दम देखते हैं

    रहा कौन महफ़िल में अब आने वाला
    वो चारों तरफ़ दम-ब-दम देखते हैं

    उधर शर्म हाइल इधर ख़ौफ़ माने
    न वो देखते हैं न हम देखते हैं

    उन्हें क्यूँ न हो दिलरुबाई से नफ़रत
    कि हर दिल में वो ग़म अलम देखते हैं

    निगहबाँ से भी क्या हुई बद-गुमानी
    अब उस को तिरे साथ कम देखते हैं

    हमें 'दाग़' क्या कम है ये सरफ़राज़ी
    कि शाह-ए-दकन के क़दम देखते हैं
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    Dagh Dehlvi
    अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता
    कभी जान सदक़े होती कभी दिल निसार होता

    कोई फ़ित्ना ता-क़यामत न फिर आश्कार होता
    तिरे दिल पे काश ज़ालिम मुझे इख़्तियार होता

    जो तुम्हारी तरह तुम से कोई झूटे वादे करता
    तुम्हीं मुंसिफ़ी से कह दो तुम्हें ए'तिबार होता

    ग़म-ए-इश्क़ में मज़ा था जो उसे समझ के खाते
    ये वो ज़हर है कि आख़िर मय-ए-ख़ुश-गवार होता

    ये मज़ा था दिल-लगी का कि बराबर आग लगती
    न तुझे क़रार होता न मुझे क़रार होता

    न मज़ा है दुश्मनी में न है लुत्फ़ दोस्ती में
    कोई ग़ैर ग़ैर होता कोई यार यार होता

    तिरे वादे पर सितमगर अभी और सब्र करते
    अगर अपनी ज़िंदगी का हमें ए'तिबार होता

    ये वो दर्द-ए-दिल नहीं है कि हो चारासाज़ कोई
    अगर एक बार मिटता तो हज़ार बार होता

    गए होश तेरे ज़ाहिद जो वो चश्म-ए-मस्त देखी
    मुझे क्या उलट न देते जो न बादा-ख़्वार होता

    मुझे मानते सब ऐसा कि अदू भी सज्दे करते
    दर-ए-यार काबा बनता जो मिरा मज़ार होता

    तुम्हें नाज़ हो न क्यूँकर कि लिया है 'दाग़' का दिल
    ये रक़म न हाथ लगती न ये इफ़्तिख़ार होता
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    Dagh Dehlvi
    आरज़ू है वफ़ा करे कोई
    जी न चाहे तो क्या करे कोई

    गर मरज़ हो दवा करे कोई
    मरने वाले का क्या करे कोई

    कोसते हैं जले हुए क्या क्या
    अपने हक़ में दुआ करे कोई

    उन से सब अपनी अपनी कहते हैं
    मेरा मतलब अदा करे कोई

    चाह से आप को तो नफ़रत है
    मुझ को चाहे ख़ुदा करे कोई

    उस गिले को गिला नहीं कहते
    गर मज़े का गिला करे कोई

    ये मिली दाद रंज-ए-फ़ुर्क़त की
    और दिल का कहा करे कोई

    तुम सरापा हो सूरत-ए-तस्वीर
    तुम से फिर बात क्या करे कोई

    कहते हैं हम नहीं ख़ुदा-ए-करीम
    क्यूँ हमारी ख़ता करे कोई

    जिस में लाखों बरस की हूरें हों
    ऐसी जन्नत को क्या करे कोई

    इस जफ़ा पर तुम्हें तमन्ना है
    कि मिरी इल्तिजा करे कोई

    मुँह लगाते ही 'दाग़' इतराया
    लुत्फ़ है फिर जफ़ा करे कोई
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    Dagh Dehlvi

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