दिल से बे-सूद और जाँ से ख़राब
हो रहा हूँ कहाँ कहाँ से ख़राब
हो रहा हूँ कहाँ कहाँ से ख़राब
ग़म की दहलीज़ है भली कितनी
कोई उठता नहीं यहाँ से ख़राब
मैं मिरा अक्स और आईना
ये नज़ारा था दरमियाँ से ख़राब
ख़ुद को ता'मीर करते करते मैं
हो गया हूँ यहाँ वहाँ से ख़राब
रौशनी इक हक़ीर तारे की
आ गई हो के कहकशाँ से ख़राब
ज़ेर-ए-लब रख छुपा के नाम उस का
लफ़्ज़ होते हैं कुछ बयाँ से ख़राब
एक मुद्दत से हूँ मैं मुंकिर-ए-इश्क़
आ मुझे कर दे अपनी हाँ से ख़राब
रंग निखरे हैं फिर वहीं पे 'बकुल'
मेरी तस्वीर थी जहाँ से ख़राब
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हुए हम बे-सर-ओ-सामान लेकिन
सफ़र को कर लिया आसान लेकिन
सफ़र को कर लिया आसान लेकिन
किनारे ज़द में आना चाहते हैं
उतरने को है अब तूफ़ान लेकिन
बहुत जी चाहता है खुल के रो लें
लहक उट्ठे न ग़म का धान लेकिन
तअ'ल्लुक़ तर्क तो कर लें सभी से
भले लगते हैं कुछ नुक़सान लेकिन
तवाज़ुन आ चला है ज़ेहन-ओ-दिल में
शिकस्ता हाल है मीज़ान लेकिन
बहुत से रंग उतरे बारिशों में
धनक के खुल गए इम्कान लेकिन
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बात बिगड़ी हुई बनी सी रही
जाँ नहीं निकली जांकनी सी रही
जाँ नहीं निकली जांकनी सी रही
बात खिंचती चली गई दिल से
उम्र भर फिर तना तनी सी रही
हुस्न-ए-शब सुब्ह-दम ढला लेकिन
पेशतर उस के चाँदनी सी रही
बहस हम को न थी मनाज़िर से
यूँ था बीनाई से ठनी सी रही
उस का रद्द-ए-अमल था ख़ंजर सा इश्क़ कहने को था अनी सी रही
सम्त दुनिया के हम गए ही नहीं
उस इलाक़े से दुश्मनी सी रही
कर के इक क़ाफ़िला ग़ुबार ग़ुबार
राह कुछ देर अन-मनी सी रही
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हमें रास आनी है राहों की गठरी
रखो पास अपनी पनाहों की गठरी
रखो पास अपनी पनाहों की गठरी
बदल जाए काश इस हसीं मरहले पर
हमारी तुम्हारी गुनाहों की गठरी
मोहब्बत की राहें थीं हमवार लेकिन
हमीं ढो न पाए निबाहों की गठरी
तकल्लुफ़ के सामान बिखरे थे बाहम
सो बाँधे रहे हम भी बाँहों की गठरी
उजाले के हैं इन दिनों दाम ऊँचे
चलो लूट लें रू-सियाहों की गठरी
धरी रह गई मुंसिफ़-ए-दिल के आगे
बयानों की गठरी गवाहों की गठरी
न उगली ही जाए न निगले बने है
गले में फँसी एक आहों की गठरी
ये सूखी हुई फ़स्ल-ए-ग़म जी उठेगी
अगर खुल गई इन निगाहों की गठरी
उठेंगी किसी रोज़ सैलाब बन कर
ये आबादियाँ हैं तबाहों की गठरी
मिरी सीधी सादी सी बातों पे मत जा
मिरी ज़ात है कज-कुलाहों की गठरी
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ये किस की याद का दिल पर रफ़ू था
कि बह जाने पे आमादा लहू था
कि बह जाने पे आमादा लहू था
चमकते हैं जो पत्थर से यहाँ अब
उन्हीं पलकों में सैल-ए-आबजू था
कशिश तुझ सी न थी तेरे ग़मों में
लब-ओ-लहजा मगर हाँ हू-ब-हू था
उजाले सी कोई शय बच गई थी
उस इक लम्हे में जब मैं था न तू था
थमी इक नब्ज़ तो उक़्दा खुला ये
ख़मोशी का सरापा हा-ओ-हू था
मिले अब के तो रोए टूट कर हम
गुनाह अपनी सज़ा के रू-ब-रू था
कभी ख़ुशबू हुआ करते थे हम भी
कभी क़िस्सा हमारा कू-ब-कू था
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तिरा लहजा वही तलवार जैसा था
मिरी गर्दन में ख़म हर बार जैसा था
मिरी गर्दन में ख़म हर बार जैसा था
उतर जाता तो रुस्वाई बहुत होती
कि सर का बोझ भी दस्तार जैसा था
तराशी हैं ग़म-ए-दौराँ ने तक़दीरें
ये ख़ंजर भी किसी औज़ार जैसा था
हँसी भी इश्तिहारों सी चमकती थी
वो चेहरा तो किसी अख़बार जैसा था
बहुत रिश्ते थे सब की क़ीमतें तय थी
हमारे घर में कुछ बाज़ार जैसा था
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मुस्कुराने का फ़न तो बअ'द का है
पहले साअ'त का इंतिख़ाब करो
अब के ता'बीर मसअला न रहे
ये जो दुनिया है इस को ख़्वाब करो
और पकने दो इश्क़ की मिट्टी
पार उजलत में मत चनाब करो
अहद-ए-नौ के अजब तक़ाज़े हैं
जो है ख़ुशबू उसे गुलाब करो
यूँ ख़ुशी की हवस न जाएगी
एक इक ग़म को बे-नक़ाब करो
हरसिंगारों से बोलती है ज़मीं
अब की रुत में मुझे किताब करो
पहले पूछो सवाल अपने तईं
फिर ख़ला से तलब जवाब करो
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बारिशों में अब के याद आए बहुत
अब्र जो बरसे नहीं छाए बहुत
अब्र जो बरसे नहीं छाए बहुत
जाने किस के ध्यान में डूबा था ख़्वाब
नींद ने कंगन तो खनकाए बहुत
फिर हुआ यूँ लग गया जी इश्क़ में
पहले पहले हम भी घबराए बहुत
मंज़िलों पर बार था रख़्त-ए-सफ़र
और हम आँसू बचा लाए बहुत
मुझ से मेरा रंग माँगे है धनक
रश्क में यूँ भी हैं हम-साए बहुत
दिल जो टूटा सज गया आँखों का हाट
इस खंडर से निकले पैराए बहुत
ज़िंदगी आख़िर पशेमाँ कर गई
हम इसी मोहलत पे इतराए बहुत
क़ाफ़िले के ग़म में ग़म शामिल नहीं
तुम 'बकुल' आगे निकल आए बहुत
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अब उजड़ने के हम न बसने के
कट गए जाल सारे फँसने के
कट गए जाल सारे फँसने के
तजरबों में न ज़हर ज़ाएअ'' कर
सीख आदाब पहले डसने के
उस से कहियो जो ख़ुद में डूबा है
तुझ पे बादल नहीं बरसने के
मिलना-जुलना अभी भी है लेकिन
हाथ से हाथ अब न मसने के
नक़्श-ए-सानी हैं झिलमिलाते सराब
नक़्श-ए-अव्वल थे पावँ धंसने के
ऐसा वीराँ हुआ है दिल इस बार
अब के इम्काँ नहीं हैं बसने के
रूठे बच्चों से छेड़ करता हूँ
ढूँढ़ता हूँ बहाने हँसने के
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हमें देखा न कर उड़ती नज़र से
उमीदों के निकल आते हैं पर से
उमीदों के निकल आते हैं पर से
अब उन की राख पलकों पर जमी है
घड़ी भर ख़्वाब चमके थे शरर से
बचाने में लगी है ख़ल्क़ मुझ को
मैं ज़ाएअ'' हो रहा हूँ इस हुनर से
वो लहजा-हा-ए-दरिया-ए-सुख़न में
मुसलसल बनते रहते हैं भँवर से
समुंदर है कोई आँखों में शायद
किनारों पर चमकते हैं गुहरस
तवक़्क़ो' है उन्हें उस अब्र से जो
दिखाई दे इधर उस ओर बरसे
ज़रा इम्कान क्या देखा नमी का
निकल आए शजर दीवार-ओ-दर से
रक़म दिल पर हुआ क्या क्या न पूछो
बयाँ होना है ये क़िस्सा नज़र से
सँभलते ही नहीं हम से 'बकुल' अब
बचे हैं दिन यहाँ जो मुख़्तसर से
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