Bakul Dev

Bakul Dev

@bakul-dev

Bakul Dev shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Bakul Dev's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

1

Content

21

Likes

2

Shayari
Audios
  • Ghazal

Ghazal

समाअ'त के लिए इक इम्तिहाँ है ख़मोशी इन दिनों मिस्ल-ए-बयाँ है सफ़र अपने ही भीतर कर रहा हूँ मिरा ठहराव मुद्दत से रवाँ है हवस शामिल है थोड़ी सी दुआ में अभी इस लौ में हल्का सा धुआँ है नया इक ख़्वाब देखें और रोएँ अब इतनी ताब आँखों में कहाँ है उड़ा देती है अपनी ख़ाक जब तब ज़मीं की जुस्तुजू भी आसमाँ है तभी आहों के सुर उठते हैं इस से हमारा सोज़-ए-जाँ ही साज़-ए-जाँ है हमेशा दूर से देखा किया हूँ जहाँ मुझ को जवाहिर की दुकाँ है मिरा किरदार इस में हो गया गुम तुम्हारी याद भी इक दास्ताँ है मोहब्बत एक कश्ती मुख़्तसर सी तमन्नाओं का दरिया बे-कराँ है मैं सारे फ़ासले तय कर चुका हूँ ख़ुदी जो दरमियाँ थी दरमियाँ है 'बकुल' ख़्वाबों के पंछी आ बसे हैं हमारा आशियाँ अब आशियाँ है — Bakul Dev
हमें रास आनी है राहों की गठरी रखो पास अपनी पनाहों की गठरी बदल जाए काश इस हसीं मरहले पर हमारी तुम्हारी गुनाहों की गठरी मोहब्बत की राहें थीं हमवार लेकिन हमीं ढो न पाए निबाहों की गठरी तकल्लुफ़ के सामान बिखरे थे बाहम सो बाँधे रहे हम भी बाँहों की गठरी उजाले के हैं इन दिनों दाम ऊँचे चलो लूट लें रू-सियाहों की गठरी धरी रह गई मुंसिफ़-ए-दिल के आगे बयानों की गठरी गवाहों की गठरी न उगली ही जाए न निगले बने है गले में फँसी एक आहों की गठरी ये सूखी हुई फ़स्ल-ए-ग़म जी उठेगी अगर खुल गई इन निगाहों की गठरी उठेंगी किसी रोज़ सैलाब बन कर ये आबादियाँ हैं तबाहों की गठरी मिरी सीधी सादी सी बातों पे मत जा मिरी ज़ात है कज-कुलाहों की गठरी — Bakul Dev
चाल अपनी अदा से चलते हैं हम कहाँ कज-रवी से टलते हैं ज़िंदगी बे-रुख़ी से पेश न आ तुझ पे एहसाँ मिरे निकलते हैं कारदाँ हैं बला के सब चेहरे आइने को हुनर से छलते हैं कोई आतिश-फ़िशाँ है सीने में अश्क मिस्ल-ए-शरर निकलते हैं उस के तर्ज़-ए-सुख़न के मारे लोग अपना लहजा कहाँ बदलते हैं आज सो लूँ कि है सुहुलत-ए-शब दिन कहाँ रोज़ रोज़ ढलते हैं आ गई लौ ख़िज़ाँ की पर्बत तक वादियों में चिनार जलते हैं पंजा-ए-ज़ेहन के तले पैहम ताइर-ए-दिल कई मचलते हैं ख़्वाब का जिन न आएगा बाहर बे-सबब आप आँख मलते हैं तुझ से किरदार हों 'बकुल' जिन में ऐसे क़िस्से कहाँ सँभलते हैं — Bakul Dev
हमें देखा न कर उड़ती नज़र से उमीदों के निकल आते हैं पर से अब उन की राख पलकों पर जमी है घड़ी भर ख़्वाब चमके थे शरर से बचाने में लगी है ख़ल्क़ मुझ को मैं ज़ाएअ'' हो रहा हूँ इस हुनर से वो लहजा-हा-ए-दरिया-ए-सुख़न में मुसलसल बनते रहते हैं भँवर से समुंदर है कोई आँखों में शायद किनारों पर चमकते हैं गुहरस तवक़्क़ो' है उन्हें उस अब्र से जो दिखाई दे इधर उस ओर बरसे ज़रा इम्कान क्या देखा नमी का निकल आए शजर दीवार-ओ-दर से रक़म दिल पर हुआ क्या क्या न पूछो बयाँ होना है ये क़िस्सा नज़र से सँभलते ही नहीं हम से 'बकुल' अब बचे हैं दिन यहाँ जो मुख़्तसर से — Bakul Dev