ये किस की याद का दिल पर रफ़ू था

कि बह जाने पे आमादा लहू था

चमकते हैं जो पत्थर से यहाँ अब
उन्हीं पलकों में सैल-ए-आबजू था

कशिश तुझ सी न थी तेरे ग़मों में
लब-ओ-लहजा मगर हाँ हू-ब-हू था

उजाले सी कोई शय बच गई थी
उस इक लम्हे में जब मैं था न तू था

थमी इक नब्ज़ तो उक़्दा खुला ये
ख़मोशी का सरापा हा-ओ-हू था

मिले अब के तो रोए टूट कर हम
गुनाह अपनी सज़ा के रू-ब-रू था

कभी ख़ुशबू हुआ करते थे हम भी
कभी क़िस्सा हमारा कू-ब-कू था

— Bakul Dev

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Yaad Shayari

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