अब उजड़ने के हम न बसने के
कट गए जाल सारे फँसने के
तजरबों में न ज़हर ज़ाएअ'' कर
सीख आदाब पहले डसने के
उस से कहियो जो ख़ुद में डूबा है
तुझ पे बादल नहीं बरसने के
मिलना-जुलना अभी भी है लेकिन
हाथ से हाथ अब न मसने के
नक़्श-ए-सानी हैं झिलमिलाते सराब
नक़्श-ए-अव्वल थे पावँ धंसने के
ऐसा वीराँ हुआ है दिल इस बार
अब के इम्काँ नहीं हैं बसने के
रूठे बच्चों से छेड़ करता हूँ
ढूँढ़ता हूँ बहाने हँसने के
— Bakul Dev















