हुए हम बे-सर-ओ-सामान लेकिन

सफ़र को कर लिया आसान लेकिन

किनारे ज़द में आना चाहते हैं
उतरने को है अब तूफ़ान लेकिन

बहुत जी चाहता है खुल के रो लें
लहक उट्ठे न ग़म का धान लेकिन

तअ'ल्लुक़ तर्क तो कर लें सभी से
भले लगते हैं कुछ नुक़सान लेकिन

तवाज़ुन आ चला है ज़ेहन-ओ-दिल में
शिकस्ता हाल है मीज़ान लेकिन

बहुत से रंग उतरे बारिशों में
धनक के खुल गए इम्कान लेकिन

— Bakul Dev

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Udasi Shayari

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