Yasmeen Hameed

Yasmeen Hameed

@yasmeen-hameed

Yasmeen Hameed shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Yasmeen Hameed's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Ghazal

क्या हुआ कोई सोचता भी नहीं और कहने को कुछ हुआ भी नहीं जैसे गुम हो गई शनाख़्त मिरी अब कोई मुझ को ढूँढ़ता भी नहीं जिस से रहने लगे गिले मुझ को वो अभी मुझ को जानता भी नहीं ऐसा ख़ामोश भी नहीं लगता और कुछ मुँह से बोलता भी नहीं चाहता है जवाब भी सारे और कुछ मुझ से पूछता भी नहीं मुस्तरद भी कभी नहीं करता वो मिरी बात मानता भी नहीं दाद देता है जीतने पे मुझे और कभी मुझ से हारता भी नहीं ख़्वाब तक मेरे छीन लेता है और कुछ मुझ से माँगता भी नहीं उस तरफ़ सब चराग़ जलते हैं जिस तरफ़ कोई रास्ता भी नहीं रात दिन पर मुहीत है तो रहे रौशनी कोई चाहता भी नहीं डूबते आफ़्ताब की जानिब देर तक कोई देखता भी नहीं — Yasmeen Hameed
ये दुनिया दूर तक का सिलसिला नईं हमें उस के लिए कुछ सोचना नईं ये पुतला इस क़दर मग़रूर क्यूँँ है तो क्या ये आसमानों से गिरा नईं बहुत पहले ये दिन आने से पहले जो होना था अभी तक भी हुआ नईं सभी हक़ फ़ैसले के मुंतज़िर हैं किसी ने ख़ून का बदला लिया नईं अभी सूरज में थोड़ी रौशनी है ज़मीं का रंग भी फीका पड़ा नईं दर-ओ-दीवार के में'मार देखें ये घर बुनियाद से अब भी हिला नईं ये रस्ता शहर के नक़्शे में होगा ये रस्ता सिर्फ़ आँखों में खुला नईं ये दुनिया इस लिए आधी है अब तक पियाला दर्द से पूरा भरा नईं वही आँखें वही चेहरा वही बात किसी तस्वीर में कुछ भी नया नईं हमें कुछ काम करने हैं यहाँ पर ये माना काम का कोई सिला नईं उसी के मशवरे को मानते हैं ये दिल जैसा भी है उतना बुरा नईं बदन की ख़ाक पर छींटे लहू के कहाँ से आए हैं हम ने कहा नईं मुसलसल रोने वाले हँस रहे हैं ये कोई छोटा-मोटा वाक़िआ'' नईं किसी के दुख का चर्चा हो रहा है कोई दुख ऐसे दुख से तो सिवा नईं ये बात इक रोज़ दुनिया मान लेगी हमारे जुर्म की कोई सज़ा नईं कोई सोता नहीं है क्या सर-ए-शाम कोई भी मुँह अंधेरे जागता नईं नहीं मालूम उन को याद है क्या हमें तो एक दिन भी भूलता नईं भुला हो गर कोई समझाए उन को नमक-पाशी में तासीर-ए-शिफ़ा नईं कहाँ पर कौन था जो अब नहीं है किसी से पूछने का हौसला नईं किसी का सोचना रुक रुक के चलना मुनासिब था मगर अच्छा लगा नईं कोई तस्लीम करता ही नहीं कुछ अभी शायद कोई इतना बड़ा नईं हमें जैसे कोई ज़िद हो गई थी जो दुनिया ने कहा हम ने किया नईं ख़ुद अपने वास्ते मुश्किल हुए जब हमें आसान फिर कुछ भी मिला नईं लिबास-ओ-वज़ा शायद एक से हों मगर अंदर से कोई एक सा नईं अभी तो ज़ेहन सैक़ल हो रहा है जो लिखना है अभी हम ने लिखा नईं अभी टुकड़े इकट्ठे हो रहे हैं अभी टूटा हुआ रिश्ता जुड़ा नईं ये मंज़र इस जगह पहले नहीं था तो क्या है फिर अगर ये मो'जिज़ा नईं नई बस्ती में आबादी बहुत है मगर कोई किसी को जानता नईं हम इक तन्हा सदी के पेश-रौ हैं हमारा ऐसा-वैसा मर्तबा नईं शजर फूटेगा फिर इक दिन ज़मीं से है दा'वा ज़िंदगी का मौत का नईं ख़ुदा से राब्ता कर के तो देखो फिर उस के बा'द कह देना ख़ुदा नईं चहार-अतराफ़ ऐसी थी चका-चौंद किसी की आँख से पर्दा हटा नईं ये लगता है मगर ये सच नहीं है कि पूरी बात कोई जानता नईं यही तूफ़ान भी बरपा करेंगे हमारे दोस्त पानी और हवा नईं इसी मिट्टी में मिट्टी हो रहेंगे इसी मिट्टी को कोई पूछता नईं उठी शो'लों से बच्चे खेलते थे लगी फिर आग तो कुछ भी बचा नईं अनासिर हुक्म की तामील में हैं दुआ की दस्तरस से मावरा नईं अगर मुबहम रहा इंसान तो क्या यहाँ तो आसमानों का सिरा नईं है मुश्किल ख़ौफ़ को तस्ख़ीर करना समुंदर पार करना मरहला नईं वहाँ के फूल चुनना चाहते हैं हमारा जिस ज़मीं से राब्ता नईं उसी के ध्यान में उलझे हुए हैं हमें जो आँख उठा के देखता नईं हमें अपनी ख़बर बस इस क़दर है कि अगली साँस तक का भी पता नईं न जाने क्या है फिर जो माँगता है ये दिल कुछ भी तो उस से माँगता नईं तमाम आसूदगी आसूदगी बस मगर ऐसे भी जीने का मज़ा नईं बराबर इज़्तिराब और बे-यक़ीनी बहुत बढ़ जाए तो ये भी भला नईं तो फिर हम किस तरह से ख़ुश रहेंगे मगर ख़ुश इस तरह कोई रहा नईं ये सब बे-कार की बातें हैं शायद हमारा अस्ल में ये मसअला नईं ये वो क्या तोड़ते हैं जोड़ते हैं न जाने क्या है जो अब तक बना नईं ग़ुबार-ए-वक़्त हैं पर मानते हैं क़ुसूर इस में ज़रा भी वक़्त का नईं बताना सोच कर ता'बीर इस की मुअब्बिर ये इशारा रात का नईं हमारी साँस उखड़ जाए तो क्या है यही तो ज़िंदगी की इंतिहा नईं ज़बाँ छालों से भर जाए तो क्या है कभी मुँह से हमें कुछ भूलना नईं अधूरी बात रह जाए तो क्या है अधूरी बात को भी क्या बक़ा नईं न आनी थी न आई दुनिया-दारी मगर शर्मिंदगी उस की ज़रा नईं बहुत ही दूर से आवाज़ आई हमें ऐसे लगा हम ने सुना नईं कभी लगता है हम वैसे नहीं हैं कभी लगता है हम उस से जुदा नईं जो ज़ाहिर था उसे तो क्या छुपाते छुपाना चाहते थे जो छुपा नईं मुसाफ़िर थोड़ी मोहलत है तिरे पास सफ़ीना इतनी जल्दी डूबता नईं बहुत कुछ है जो पानी पे लिखा है किसी ने आज तक भी जो पढ़ा नईं किसी की मौत का मतलब फ़ना है किसी की मौत का मतलब फ़ना नईं — Yasmeen Hameed
ख़लिश है ख़्वाब है आधी कहानी है हमारी बात तो बस आनी जानी है समुंदर से तुम्हें वहशत है क्यूँ इतनी इसे छू कर तो देखो सिर्फ़ पानी है मैं कुछ भी पूछ लूँ क्या फ़र्क़ पड़ता है तुम्हें तो बात ही कोई बनानी है ज़रा बतलाओ तुम किस किस से मिलते हो तुम्हारे शहर में कितनी गिरानी है तुम्हें दुनिया से मतलब है मुझे तुम से तो फिर ये किस तरह की हम-ज़बानी है हम इस पहलू से भी तो सोच सकते हैं सितारा रात की पहली निशानी है ज़मीं को आते जाते मौसमों से क्या उसे तो आग मिट्टी से बुझानी है सभी हैं सुर्ख़-रू अपनी अदालत में किसी ने कब किसी की बात मानी है — Yasmeen Hameed
सानेहा क़िस्मतों के दरीचों में लपकेगा छुप जाएगा बात टल जाएगी सब मुसाफ़िर घरों को पलट जाएँगे ग़म की वहशत ख़ुशी में बदल जाएगी हम सितारों की मानिंद टूटेंगे और आसमाँ पर लकीरें बना जाएँगे मौत का रक़्स करती हुई एक साअ'त रुकेगी कहीं फिर सँभल जाएगी सारे बिखरे हुए लफ़्ज़ कोई उठा लाएगा आन की आन में और फिर उलझी उलझी ज़बाँ अपनी तरतीब बदलेगी और इक कहानी में ढल जाएगी एक दिन हम इरादा करेंगे कि अब अपने ख़्वाबों की क़ीमत नहीं लेंगे हम एक दिन हम बदल जाएँगे और फिर ख़ुद-ब-ख़ुद सारी दुनिया बदल जाएगी जब सितारे बुझेंगे तो शब के समुंदर में लहरों का रुख़ देखने के लिए सुब्ह-ए-काज़िब की आँखें अचानक खुलेंगी बशारत की क़िंदील जल जाएगी दर्द की लौ की मद्धम हरारत के पहलू में पत्थर का दिल भी तड़ख़ जाएगा ये जो लोहे की दीवार अतराफ़-ए-जाँ खींच रखी है ये भी पिघल जाएगी ये भी होगा कि दिल ऐसे हो जाएगा जैसे इस में कोई आरज़ू ही न थी इतना ख़ाली ये हो जाएगा ख़ाली होने की दिल से ख़लिश भी निकल जाएगी — Yasmeen Hameed
तअ'ल्लुक़ के बहाव का मुक़द्दम इस्तिआ'रा किस जगह है मिरे गहरे समुंदर तेरी वहशत का किनारा किस जगह है बता ऐ रोज़-ओ-शब की बे-सबाती में तवाज़ुन रखने वाले जिसे कल टूटना है आज वो रौशन सितारा किस जगह है बता सरसब्ज़ खेतों से गुज़रने वाले बे-आवाज़ दरिया अचानक पेच खा कर रुख़ बदलने का इशारा किस जगह है बशारत जिस के होने की मुझे पहले क़दम पर दी गई थी वो गहरे अब्र का साया मसाफ़त का सहारा किस जगह है सफ़र करना है और अंधा मुसाफ़िर सोचता है किस से पूछे सर-ए-हस्ती अंधेरे रास्तों का गोश्वारा किस जगह है न सत्ह-ए-आब पर है और न तह में इस के हैं आसार कोई बता ऐ बहर-ए-ग़म काग़ज़ की कश्ती को उतारा किस जगह है — Yasmeen Hameed
कोई पूछे मिरे महताब से मेरे सितारों से छलकता क्यूँँ नहीं सैलाब में पानी किनारों से मुकम्मल हो तो सच्चाई कहाँ तक़्सीम होती है ये कहना है मोहब्बत के वफ़ा के हिस्सा-दारों से ठहर जाए दर ओ दीवार पर जब तीसरा मौसम नहीं कुछ फ़र्क़ पड़ता फिर ख़िज़ाओं से बहारों से बगूले आग के रक़्साँ रहे ता देर साहिल पर समुंदर का समुंदर छुप गया उड़ते शरारों से मिरी हर बात पस-मंज़र से क्यूँँ मंसूब होती है मुझे आवाज़ सी आती है क्यूँँ उजड़े दयारों से जहाँ ता-हद्द-ए-बीनाई मुसाफ़िर ही मुसाफ़िर हों निशाँ क़दमों के मिट जाते हैं ऐसी रहगुज़ारों से — Yasmeen Hameed

Nazm

जो बार-आवर नहीं होता वो लम्हा कैसा होता है जो रंग-ओ-ख़ुशबूओं के आबगीने तोड़ देता है जो यादों की खुली आँखों को अपने सर्द हाथों के असर से मूँद देता है जो दिन की रौशनी में शब की आमेज़िश से ऐसी साअ'तें तख़्लीक़ करता है जो आसूदा ही होती हैं न अफ़्सुर्दा ही होती हैं कभी हँसती कभी बे-तरह रोती हैं जो रस्ता खोजती और मंज़िलों को भूल जाती हैं जो ज़िंदा हैं न मरती हैं जो डरती हैं अदा-ए-वक़्त से रुकती न चलती हैं फ़सील-ए-बे-यक़ीनी पर रखी शम्ओं' की सूरत आस में बुझती न जलती हैं जो ऐसी साअ'तें तख़्लीक़ करता है वो लम्हा कैसा होता है किसी पादाश की तकमील का हिस्सा कि हर्फ़-ए-कातिब-ए-तक़दीर होता है — Yasmeen Hameed