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ज़बाँ तक जो न आए वो मोहब्बत और होती है
फ़साना और होता है हक़ीक़त और होती है
फ़साना और होता है हक़ीक़त और होती है
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ज़बाँ तक जो न आए वो मोहब्बत और होती है
फ़साना और होता है हक़ीक़त और होती है
फ़साना और होता है हक़ीक़त और होती है
नहीं मिलते तो इक अदना शिकायत है न मिलने की
मगर मिल कर न मिलने की शिकायत और होती है
ये माना शीशा-ए-दिल रौनक़-ए-बाज़ार-ए-उल्फ़त है
मगर जब टूट जाता है तो क़ीमत और होती है
निगाहें ताड़ लेती हैं मोहब्बत की अदाओं को
छुपाने से ज़माने भर की शोहरत और होती है
ये माना हुस्न की फ़ितरत बहुत नाज़ुक है ऐ 'वामिक़'
मिज़ाज-ए-इश्क़ की लेकिन नज़ाकत और होती है
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थक गई रात मसकने लगा ग़ाज़ा का फ़ुसूँ
सर्द पड़ने लगीं गर्दन में हमाइल बाँहें
फ़र्श बिस्तर पे बिखरने लगे अफ़्शाँ के चराग़
मुज़्महिल सी नज़र आने लगीं इशरत-गाहें
ज़िंदगी कितने ही वीरानों में दम तोड़ चुकी
अब भी मिलती हैं मगर ग़म की फ़सुर्दा राहें
जिस तरह ताक़ में जल बुझती हैं शम्ओं की क़तार
ज़ुल्मत-ए-शब में जगाती हुई काशानों को
बन के रह जाती है ता-सुब्ह पतंगों का मज़ार
ख़ून के हर्फ़ों में तहरीर है दीवारों पर
इन घिसटते हुए अज्साम के अम्बारों में
दर्द के रुख़ को पलट देने का मक़्दूर नहीं
फ़िक्र घबराई हुई फिरती है बाज़ारों में
उम्र इक सैल-ए-अफ़ूनत है बदर-रू की मिसाल
ज़ीस्त इक चा-ब-चा सड़ता हुआ गदला पानी
जिस से सैराब हुआ करते हैं ख़िंज़ीर ओ शग़ाल
वक़्त की जलती हुई राख से झुलसे हुए पाँव
की घनी छाँव में बैठे हुए दिल
कर्ब-ए-माज़ी के गिराँ बोझ से डूबी नब्ज़ें
लाख चाहें पे उभरने का गुमाँ ला-हासिल
एक मौहूम सी हसरत में जिए जाते हैं
नाम ही नाम मसर्रत का लिए जाते हैं
अपनी बे-ख़्वाब तमन्ना का फ़साना है यही
कल की शब और नई और नई शब होगी
ज़िंदगी होगी नई और कहानी भी नई
सब्र ऐ दोस्त कि ज़ुल्मत की घड़ी बीत गई
थक गई रात मसलने लगा ग़ाज़ा का फ़ुसूँ
सर्द पड़ने लगीं गर्दन में हमाइल बाँहें
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"ज़मीर"
रूह नापाक मिरी क़ल्ब भी नापाक मिरा
नफ़्स-ए-अम्मारा बहुत हो गया बेबाक मिरा
बोझ में अपने ही माज़ी के दबा जाता हूँ
अपनी ही आग में अब ख़ुद ही जला जाता हूँ
किस तरफ़ जाऊँ कहाँ धोऊँ मैं अपना दामन
मेरे मक़्तूल मिरे साथ हैं बे-ग़ुस्ल-ओ-कफ़्न
देखता हूँ शब-ए-तारीक में जब मैं तारे
नोक-ए-नेज़ा पे नज़र आते हैं कितने बच्चे
आज तक याद हैं मुझ को वो निगाहें मासूम
इन ही हाथों ने जिन्हें कर दिया बढ़ कर मादूम
छातियाँ माँओं की हँस हँस के हैं मैं ने काटीं
हड्डियों से मिरी तलवार ने सड़कें पाटीं
अपनी हर ज़र्ब का अब ख़ुद ही निशाना हूँ मैं
जुर्म उनवान हो जिस का वो फ़साना हूँ मैं
मैं ने इस्मत के सनम ख़ानों को मिस्मार किया
अपनी बहनों को सुपुर्द-ए-सर-ए-बाज़ार किया
कितने मह-पारे हुए ख़ुद मिरी ज़ुल्मत का शिकार
कौन कर सकता है अब मेरे गुनाहों का शुमार
चौंक चौंक उठता हूँ रातों को मैं अक्सर अब भी
चीख़ें रह रह के मिरे कानों में आती हैं वही
अपने किरदार को अब कैसे भुलाऊँ ऐ दोस्त
अपनी ही लाश को अब कैसे उठाऊँ ऐ दोस्त
खाए जाता है मुझे अब मिरे माज़ी का ख़याल
क्या मिरे जुर्म की पादाश है इस दर्जा मुहाल
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"देहली"
हमारी मजलिस-ए-शूरा के ऊँचे ऊँचे महल
नज़र झुकाए जुमूद-ए-अमल से सर बोझल
वो बेबसी कि ज़रा आगे बढ़ नहीं सकते
किताब-ए-वक़्त की तहरीर पढ़ नहीं सकते
भड़क रहे हैं निगाहों के सामने शो'ले
ज़बाँ न मुँह में हो जिस के वो किस तरह बोले
ये शहर-ए-दिल्ली बहिश्त-ए-नज़र जो था कल तक
बना हुआ है जहन्नम ज़मीं से ता-ब-फ़लक
सियाह-शोले दिलों की सियाहियाँ ले कर
उठे हैं आज वतन की तबाहियाँ ले कर
मकाँ को ख़ुद ही मकीनों ने कर दिया बर्बाद
मिटा दी अपने ही हाथों से सतवत-ए-अज्दाद
ख़ुद अपनी तेग़ों से अपने ही गर्दनें काटें
तड़पती लाशों से नफ़रत की ख़ंदक़ें पाटें
तमाम शहर पे छाई हुई है इक वहशत
नज़र झपकते ही कैसी बदल गई हालत
दुकानें लुट रही हैं गोलियों की बारिश है
सियाहकारों से अहल-ए-दुवल की साज़िश है
दरिंदे दौड़ते फिरते हैं सड़ती लाशों में
लहू से तर किए नाख़ून गोश्त दाँतों में
घरों का हाल तो बाज़ार से भी बद-तर है
जिधर उठाओ नज़र ज़िंदगी मुकद्दर है
जो लुट चुके हैं वो घर साएँ साएँ करते हैं
जो जल रहे हैं अभी सर्द आहें भरते हैं
निकल पड़े हैं मकानों को छोड़ कर शहरी
जब आबरू पे बन आई तो मौत की ठहरी
हज़ारों औरतों का आज लुट रहा है सुहाग
न जाने कितनी तमन्नाओं में लगी है आग
यतीम बच्चे बिलकते हैं गोदियों के लिए
ग़रीब शहर तरसते हैं रोटियों के लिए
उजड़ के कितने मआबिद बने सियह-ख़ाने
जो आदमी को न समझा ख़ुदा को क्या जाने
ये हाल देख के सकते में आ गई है फ़सील
तमाम क़िले का मैदाँ बना है ख़ून की झील
बहाए बैठी है आँसू लहू के चाँदनी-चौक
क़रोल-बाग़ के दिल में क़रोलियों की नोक
पुरानी दिली से भी बढ़ गई नई दिल्ली
पुराने क़िले में जा कर बसी नई दिल्ली
हज़ार बार ये बस्ती उजड़ उजड़ के बसी
हज़ार बार ये दिल्ली बिगड़ बिगड़ के बनी
मगर कुछ अब की दफ़ा इस तरह के चरके हैं
कि जितनी चोटें हैं उतने ही दिल के टुकड़े हैं
ये जुड़ तो सकते हैं लेकिन कहाँ है वो मरहम
जो टूटे रिश्तों को क़ौमों के कर दे फिर बाहम
मगर ये कैसे हो जब चारासाज़ ख़ुद लाचार
इलाज कौन करे जब तबीब ख़ुद बीमार
हमारी मजलिस-ए-शूरा के ऊँचे ऊँचे महल
नज़र झुकाए जुमूद-ए-अमल से सर बोझल
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ज़िंदगी कौन सी मंज़िल पे रुकी है आ कर
आगे चलती भी नहीं
राह बदलती भी नहीं
सुस्त-रफ़्तार है ये दौर-ए-उबूरी कितना
सख़्त ओ बे-जान है वो पैकर नूरी कितना
चाँद इक ख़्वाब जो था
शहर-ए-उम्मीद तह-ए-आब जो था
हुस्न के माथे का नन्हा टीका
पाए आदम के तले आते ही
उतरे चेहरे की तरह हो गया कितना फीका
हम-जुनूँ केश ओ तरह-दार हमेशा के जो थे
भागते-सायों के पीछे दौड़े
दाहने बाएँ जो डालीं नज़रें
हो के बे-कैफ़ हटा लीं नज़रें
मौत अफ़्लास जफ़ा अय्यारी
भूत इफ़रीत चुड़ैलें ख़्वारी
नाचती गाती थिरकती हँसती
क़हक़हे गालियाँ लड़ती डसती
हड्डियाँ चूसती यर्क़ान-ज़दा लाशों की
पंजों में तार-ए-कफ़न
शो'ला दहन
बस्ती की बस्तियाँ झुलसाती हुई
शहर पहुँचीं तो खुले दर पाए
चढ़ गईं सीढ़ियों पर खट खट खट
बदन होने लगे पट
ले लिया दाँतों में शिरयानों को
वेम्पाएर की तरह
ज़िंदगी कौन सी मंज़िल पे रुकी है आ कर
आगे चलती भी नहीं
राह बदलती भी नहीं
मसअला ये है कि अब इस में पहल कौन करे
आसमाँ दूर
ज़मीं चूर
कहाँ जाए कोई
काश ऐसे में चला आए कोई
दिल-ए-आशुफ़्ता को बहलाए कोई बतलाए कोई
किस तरह फूटती है ख़ुश्क शजर में कोंपल
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"कार्ल मार्क्स"
मार्क्स के इल्म ओ फ़तानत का नहीं कोई जवाब
कौन उस के दर्क से होता नहीं है फ़ैज़-याब
उस की दानाई का हासिल नाख़ुन-ए-उक़्दा-कुशा
ताबनाकी-ए-ज़मीर-ओ-ज़ीरकी का आफ़्ताब
चाहने वालों का उस की ज़िक्र ही क्या कीजिए
उस के दुश्मन भी सिरहाने रखते हैं उस की किताब
माद्दी तारीख़-ए-आलम जिस की तालीफ़-ए-अज़ीम
तास कैपिटाल है या ज़ीस्त का लुब्ब-ए-लुबाब
पढ़ के जिस के हो गईं हुश्यार अक़वाम-ए-ग़ुलाम
इश्तिराकी फ़ल्सफ़ा का खुल गया हर दिल में बाब
कितने दोज़ख़ उस के इक मंशूर से जन्नत बने
कितने सहराओं को जिस ने कर दिया शहर-ए-गुलाब
मार्क्स ने साइंस ओ इंसाँ को किया है हम-कनार
ज़ेहन को बख़्शा शुऊर-ए-ज़िंदगानी का निसाब
उस की बींनिश उस की वज्दानी-निगाह-ए-हक़-शनास
कर गई जो चेहरा-ए-इफ़्लास-ए-ज़र को बे-नक़ाब
'ग़सब'-ए-उजरत को दिया 'सरमाया' का जिस ने लक़ब
बे-हिसाब उस की बसीरत उस की मंतिक़ ला-जवाब
आफ़्ताब ताज़ा की उस ने बशारत दी हमें
उस की हर पेशन-गोई है बरफ़्गंदा नक़ाब
कोई क़ुव्वत उस की सद्द-ए-राह बन सकती नहीं
वक़्त का फ़रमान जब आता है बन कर इंक़िलाब
अहल-ए-दानिश का रजज़ और सीना-ए-दहक़ाँ की ढाल
लश्कर मज़दूर के हैं हम-सफ़ीर ओ हम-रिकाब
काटती है सेहर-ए-सुल्तानी को जब मूसा की ज़र्ब
सतवत-ए-फ़िरऔन हो जाती है अज़ ख़ुद ग़र्क़-ए-आब
आज की फ़िरऔनियत भी कुछ इसी अंदाज़ से
रफ़्ता रफ़्ता होती जाएगी शिकार-ए-इंक़िलाब
लड़ रहा है जंग आख़िर कीसा-ए-सरमाया-दार
जौहरी हथियार से करता नहीं जो इज्तिनाब
अपने मुस्तक़बिल से ताग़ूती तमद्दुन को है यास
दीदनी है दुश्मन-ए-इंसानियत का इज़्तिराब
हज़रत-ए-इक़बाल का इब्लीस-ए-कोचक ख़ौफ़ से
लरज़ा-बर-अंदाम यूँ शैताँ से करता है ख़िताब
पंडित ओ मुल्ला ओ राहिब बे-ज़रर ठहरे मगर
टूटने वाला है तुझ पर इक यहूदी का इताब
वो कलीम-ए-बे-तजल्ली वो मसीह-ए-बे-सलीब
नीस्त पैग़म्बर ओ लेकिन दर बग़ल दारद किताब
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