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या तो भरम बना रहे इतना ख़ुदा करे
इनकार अपने होने से वरना ख़ुदा करे
इनकार अपने होने से वरना ख़ुदा करे
मुश्किल है मेरा काम तो मिल बाँटकर करें
आधा करा दें राम जी आधा ख़ुदा करे
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माना कि मेरा जिस्म ये जूठा गिलास है
लेकिन ये दिल तो आज भी कोरा गिलास है
लेकिन ये दिल तो आज भी कोरा गिलास है
कितनी है कैसी मय है यही बात है बड़ी
चाँदी या काँच का सही रहता गिलास है
कुछ तिश्नगी भी रखनी थी जानाँ सँभाल के
तुम ने हिफ़ाज़तों से जो रक्खा गिलास है
पीने का लुत्फ़ है तभी जब ये रहे न इल्म
तेरा गिलास है कि ये मेरा गिलास है
क़ीमत तो मेरी प्यास की भी कम नहीं हुज़ूर
ये और बात आप का महँगा गिलास है
तुम को भी इस जहान का आ ही गया चलन
पीने के बा'द तुम ने भी फेंका गिलास है
मुँह से लगा मैं पी गया बोतल तो शोर क्यूँ
शिद्दत की प्यास को कहाँ मिलता गिलास है
दुनिया का मैं ज़रूर हूँ पर शाम ही तलक
फिर उस के बा'द तो मिरी दुनिया गिलास है
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ख़ुद को समेटने में थी इतनी अगर-मगर
बिखरा पड़ा हूँ आज भी तेरे इधर-उधर
बिखरा पड़ा हूँ आज भी तेरे इधर-उधर
अपनी कमी से कह दो कि शिद्दत से तो रहे
देखो कि रह न जाए कहीं कुछ कसर-वसर
इक रोज़ तुम भी तो ज़रा ख़ुद से निकल मिलो
तय कर लिए हैं मैं ने तो सारे सफ़र-वफ़र
नफ़रत तिरी या प्यार हो ग़म हो शराब हो
मुमकिन नहीं है थोड़े में अपनी गुज़र-बसर
तू क्या गई मैं हो गया हूँ सख़्त-जान माँ
लगती नहीं है अब तो मुझे कुछ नज़र-वज़र
मुद्दत से कुछ भी तो तेरी चलती नहीं ख़ुदा
रक्खा तू कर जहान की भी कुछ ख़बर-वबर
बस इश्क़ का है मारा तो कुछ शे'र कह दिए
वर्ना है ‘आश्ना’ में कहाँ कुछ हुनर-वुनर
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उसे कहो कोई तस्वीर भेज दे अपनी
जो जी रहे हो तो कोई दलील भी रक्खो
न जाने कौन से अश'आर किस को चुभ जाएँ
जो सच्चे शे'र हैं कहने वकील भी रक्खो
तुम्हें भी चाहिए इज़्ज़त अगर ज़माने से
तो अपने आप को थोड़ा ज़लील भी रक्खो
तमाम लोगों की सरगर्मीयों का मौसम है
जुनूँ के शहर में कोई सबील भी रखो
उतार कर ये उदासी कभी तो टाँग सको
किसी दिवाल पे इक ऐसी कील भी रक्खो
बड़े मज़े की सवारी है दिल का ये टट्टू
लगाम कस के रखो और ढील भी रक्खो
ग़मों की सोहबतें अच्छी न फ़ासले अच्छे
इन्हें हिसार में रक्खो फ़सील भी रक्खो
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फ़ैसला उस पार या इस पार होना चाहिए
क्यूँ जुनून-ए-इश्क़ को मँझधार होना चाहिए
क्यूँ जुनून-ए-इश्क़ को मँझधार होना चाहिए
फूल सारे ही चमन के दाद के हैं मुस्तहिक़
इश्क़ आख़िर क्यूँ फ़क़त इक बार होना चाहिए
इश्क़ का इज़हार इतना और अमल कुछ भी नहीं
आप का तो नाम ही सरकार होना चाहिए
मैं नहीं तो क्या हज़ारों और तारे हैं यहाँ
क्यूँ किसी भी रात को बेज़ार होना चाहिए
उम्र भर आँखों ने तेरे हिज्र में रोज़ा रखा
ज़िंदगी की शाम है इफ़्तार होना चाहिए
तुझ को माँगा जब दुआ में हँस के ये बोले ख़ुदा
ज़िंदगी में कुछ न कुछ दुश्वार होना चाहिए
'आश्ना' कुछ काम करते हो तो हो किस काम के
तुम तो शाइ'र हो तुम्हें बे-कार होना चाहिए
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मिरे कानों में जो तू कुन कह दे
मैं तसव्वुर सा तिरा हो जाऊँ
मुझ से इक बार ज़रा मिल ऐसे
मैं तिरे घर का पता हो जाऊँ
तू भी आ जाना कहीं रख के बदन
जिस्म से मैं भी जुदा हो जाऊँ
तोड़ कर माटी ये मेरी फिर से
यूँ बनाओ कि नया हो जाऊँ
इश्क़ की रस्म यही है बाक़ी
मैं भी इक बार ख़फ़ा हो जाऊँ
आशनाई है सुख़न-गोई भी
और कितना मैं बुरा हो जाऊँ
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अजब सी आज-कल मैं इक परेशानी में हूँ यारो
यही मुश्किल मेरी है बस मैं आसानी में हूँ यारो
यही मुश्किल मेरी है बस मैं आसानी में हूँ यारो
मुझे उन झील सी आँखों में यूँ भी डूबना ही है
न पूछो बारहा कितने में अब पानी में हूँ यारो
न सूरत वस्ल की कोई न कोई हिज्र का ग़म है
मैं अब के बार कुछ ऐसी ही वीरानी में हूँ यारो
मुझे लगता था मुमकिन ही नहीं है उस के बिन जीना
मैं ज़िंदा हूँ मगर मुद्दत से हैरानी में हूँ यारो
बदन का पैरहन छोटा मुझे पड़ने लगा इतना
मैं खुल कर साँस लेने को भी उर्यानी में हूँ यारो
ख़ुदा ने रख दिया मुझ को उसी के दिल में जाने क्यूँ
न बाहोँ में हूँ मैं जिस की न पेशानी में हूँ यारो
उसी इक 'आशना' को ढूँढती हर पल मिरी आँखें
मैं रहता रात-दिन जिस की निगहबानी में हूँ यारो
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सब ज़रूरत का तो सामान है घर में रहिए
क्या हुआ गर कोई हलकान है घर में रहिए
क्या हुआ गर कोई हलकान है घर में रहिए
भीड़ में भी न थे सीने से लगाने वाले
आज तो शहर ही वीरान है घर में रहिए
साँस घुट जाएगी दीवारों के के अंदर इक दिन
और सुनते हैं कि दरमान है घर में रहिए
बंद हैं मंदिर ओ मस्जिद की दुकानें सारी
आज बाज़ार ये सुनसान है घर में रहिए
कल तलक मुल्क से बाहर जो किए देते थे
अब तो उन का भी ये फ़रमान है घर में रहिए
हर मरज़ में नहीं होती है सुहूलत इतनी
भूक से मरना तो आसान है घर में रहिए
क़ैद फिर क़ैद ही होती है मगर हस्ब-ए-हाल
सब से बेहतर यही ज़िंदान है घर में रहिए
आप दिल से मुझे बे-दख़्ल किए देते हैं
अब तो सरकार का एलान है घर में रहिए
उस की तस्वीर इन आँखों के लिए काफ़ी है
और फिर मीर का दीवान है घर में रहिए
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सब ज़रूरत का तो सामान है घर में रहिए
क्या हुआ गर कोई हलकान है घर में रहिए
क्या हुआ गर कोई हलकान है घर में रहिए
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