Vineet Aashna

Vineet Aashna

@vineet-aashna

Vineet Aashna shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Vineet Aashna's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

Ghazal

मूँद कर बस आँख अपनी उन मनाज़िर के ख़िलाफ़ कर रहे हैं हम बग़ावत दौर-ए-हाज़िर के ख़िलाफ़ तुझ तलक आवाज़ मेरी जाते जाते खो गई रास्ते सब हो गए हैं इस मुसाफ़िर के ख़िलाफ़ हौसला जो है तो ललकारो ख़ुदा को भी कभी क्या मिलेगा तुम को हो कर हम से काफ़िर के ख़िलाफ़ एक अदना दिल के हाथों दोनों हैं मजबूर हम आओ था में हाथ हम उस शय-ए-शातिर के ख़िलाफ़ इक तरफ़ था मैं निहत्था इक तरफ़ वो गुल-बदन इश्क़ की बाज़ी मैं हारा एक माहिर के ख़िलाफ़ एक इक कर के सभी पुर्ज़े उसी के हो गए अब बदन में हूँ मैं तन्हा हुस्न-ए-जाबिर के ख़िलाफ़ 'आश्ना' फिर ख़्वाब में आया नहीं तू रात भर तू भी शायद हो गया है एक शाइ'र के ख़िलाफ़ — Vineet Aashna
रखें हैं सहरा जो इतने तो झील भी रक्खो कभी विसाल को थोड़ा तवील भी रक्खो उसे कहो कोई तस्वीर भेज दे अपनी जो जी रहे हो तो कोई दलील भी रक्खो न जाने कौन से अश'आर किस को चुभ जाएँ जो सच्चे शे'र हैं कहने वकील भी रक्खो तुम्हें भी चाहिए इज़्ज़त अगर ज़माने से तो अपने आप को थोड़ा ज़लील भी रक्खो तमाम लोगों की सरगर्मीयों का मौसम है जुनूँ के शहर में कोई सबील भी रखो उतार कर ये उदासी कभी तो टाँग सको किसी दिवाल पे इक ऐसी कील भी रक्खो बड़े मज़े की सवारी है दिल का ये टट्टू लगाम कस के रखो और ढील भी रक्खो ग़मों की सोहबतें अच्छी न फ़ासले अच्छे इन्हें हिसार में रक्खो फ़सील भी रक्खो — Vineet Aashna
उस के दिल में भी ज़रा सी छटपटाहट छोड़ दें जाते जाते उस के दर पर अपनी आहट छोड़ दें जाम-ए-साक़ी मय-कदे सब छोड़ तो आए मगर ये नहीं मुमकिन हम अपनी लड़खड़ाहट छोड़ दें क्या करेंगे हम क़फ़स को छोड़ कर ज़ेर-ए-फ़लक शर्त जब ये है कि अपनी फड़फड़ाहट छोड़ दें छोड़ने को छोड़ देंगे ज़िंदगी भी शौक़ से वो किसी दिन बस ज़रा जो हिचकिचाहट छोड़ दें काम आएँगे यही बोसे उदासी के ख़िलाफ़ एक दूजे के लबों पर मुस्कुराहट छोड़ दें उस से मिलने जा रहे हैं ठीक से तय्यार हों ये न हो जल्दी में अपनी हड़बड़ाहट छोड़ दें 'आश्ना' हो जाएगा मौसम गुलाबी शहर का हम तिरे आने की बस जो सुगबुगाहट छोड़ दें — Vineet Aashna
सब ज़रूरत का तो सामान है घर में रहिए क्या हुआ गर कोई हलकान है घर में रहिए भीड़ में भी न थे सीने से लगाने वाले आज तो शहर ही वीरान है घर में रहिए साँस घुट जाएगी दीवारों के के अंदर इक दिन और सुनते हैं कि दरमान है घर में रहिए बंद हैं मंदिर ओ मस्जिद की दुकानें सारी आज बाज़ार ये सुनसान है घर में रहिए कल तलक मुल्क से बाहर जो किए देते थे अब तो उन का भी ये फ़रमान है घर में रहिए हर मरज़ में नहीं होती है सुहूलत इतनी भूक से मरना तो आसान है घर में रहिए क़ैद फिर क़ैद ही होती है मगर हस्ब-ए-हाल सब से बेहतर यही ज़िंदान है घर में रहिए आप दिल से मुझे बे-दख़्ल किए देते हैं अब तो सरकार का एलान है घर में रहिए उस की तस्वीर इन आँखों के लिए काफ़ी है और फिर मीर का दीवान है घर में रहिए — Vineet Aashna
माना कि मेरा जिस्म ये जूठा गिलास है लेकिन ये दिल तो आज भी कोरा गिलास है कितनी है कैसी मय है यही बात है बड़ी चाँदी या काँच का सही रहता गिलास है कुछ तिश्नगी भी रखनी थी जानाँ सँभाल के तुम ने हिफ़ाज़तों से जो रक्खा गिलास है पीने का लुत्फ़ है तभी जब ये रहे न इल्म तेरा गिलास है कि ये मेरा गिलास है क़ीमत तो मेरी प्यास की भी कम नहीं हुज़ूर ये और बात आप का महँगा गिलास है तुम को भी इस जहान का आ ही गया चलन पीने के बा'द तुम ने भी फेंका गिलास है मुँह से लगा मैं पी गया बोतल तो शोर क्यूँ शिद्दत की प्यास को कहाँ मिलता गिलास है दुनिया का मैं ज़रूर हूँ पर शाम ही तलक फिर उस के बा'द तो मिरी दुनिया गिलास है — Vineet Aashna
ख़ुद को समेटने में थी इतनी अगर-मगर बिखरा पड़ा हूँ आज भी तेरे इधर-उधर अपनी कमी से कह दो कि शिद्दत से तो रहे देखो कि रह न जाए कहीं कुछ कसर-वसर इक रोज़ तुम भी तो ज़रा ख़ुद से निकल मिलो तय कर लिए हैं मैं ने तो सारे सफ़र-वफ़र नफ़रत तिरी या प्यार हो ग़म हो शराब हो मुमकिन नहीं है थोड़े में अपनी गुज़र-बसर तू क्या गई मैं हो गया हूँ सख़्त-जान माँ लगती नहीं है अब तो मुझे कुछ नज़र-वज़र मुद्दत से कुछ भी तो तेरी चलती नहीं ख़ुदा रक्खा तू कर जहान की भी कुछ ख़बर-वबर बस इश्क़ का है मारा तो कुछ शे'र कह दिए वर्ना है ‘आश्ना’ में कहाँ कुछ हुनर-वुनर — Vineet Aashna
फ़ैसला उस पार या इस पार होना चाहिए क्यूँ जुनून-ए-इश्क़ को मँझधार होना चाहिए फूल सारे ही चमन के दाद के हैं मुस्तहिक़ इश्क़ आख़िर क्यूँ फ़क़त इक बार होना चाहिए इश्क़ का इज़हार इतना और अमल कुछ भी नहीं आप का तो नाम ही सरकार होना चाहिए मैं नहीं तो क्या हज़ारों और तारे हैं यहाँ क्यूँ किसी भी रात को बेज़ार होना चाहिए उम्र भर आँखों ने तेरे हिज्र में रोज़ा रखा ज़िंदगी की शाम है इफ़्तार होना चाहिए तुझ को माँगा जब दुआ में हँस के ये बोले ख़ुदा ज़िंदगी में कुछ न कुछ दुश्वार होना चाहिए 'आश्ना' कुछ काम करते हो तो हो किस काम के तुम तो शाइ'र हो तुम्हें बे-कार होना चाहिए — Vineet Aashna
अजब सी आज-कल मैं इक परेशानी में हूँ यारो यही मुश्किल मेरी है बस मैं आसानी में हूँ यारो मुझे उन झील सी आँखों में यूँँ भी डूबना ही है न पूछो बारहा कितने में अब पानी में हूँ यारो न सूरत वस्ल की कोई न कोई हिज्र का ग़म है मैं अब के बार कुछ ऐसी ही वीरानी में हूँ यारो मुझे लगता था मुमकिन ही नहीं है उस के बिन जीना मैं ज़िंदा हूँ मगर मुद्दत से हैरानी में हूँ यारो बदन का पैरहन छोटा मुझे पड़ने लगा इतना मैं खुल कर साँस लेने को भी उर्यानी में हूँ यारो ख़ुदा ने रख दिया मुझ को उसी के दिल में जाने क्यूँँ न बाहोँ में हूँ मैं जिस की न पेशानी में हूँ यारो उसी इक 'आशना' को ढूँढती हर पल मिरी आँखें मैं रहता रात-दिन जिस की निगहबानी में हूँ यारो — Vineet Aashna
सब ज़रूरत का तो सामान है घर में रहिए क्या हुआ गर कोई हलकान है घर में रहिए भीड़ में भी न थे सीने से लगाने वाले आज तो शहर ही वीरान है घर में रहिए साँस घुट जाएगी दीवारों के के अंदर इक दिन और सुनते हैं कि दरमान है घर में रहिए बंद हैं मंदिर ओ मस्जिद की दुकानें सारी आज बाज़ार ये सुनसान है घर में रहिए कल तलक मुल्क से बाहर जो किए देते थे अब तो उन का भी ये फ़रमान है घर में रहिए हर मरज़ में नहीं होती है सुहूलत इतनी भूक से मरना तो आसान है घर में रहिए क़ैद फिर क़ैद ही होती है मगर हस्ब-ए-हाल सब से बेहतर यही ज़िंदान है घर में रहिए आप दिल से मुझे बे-दख़्ल किए देते हैं अब तो सरकार का एलान है घर में रहिए उस की तस्वीर इन आँखों के लिए काफ़ी है और फिर मीर का दीवान है घर में रहिए — Vineet Aashna