KHud ko sametne men thii itni agar-magar | ख़ुद को समेटने में थी इतनी अगर-मगर

  - Vineet Aashna

ख़ुद को समेटने में थी इतनी अगर-मगर
बिखरा पड़ा हूँ आज भी तेरे इधर-उधर

अपनी कमी से कह दो कि शिद्दत से तो रहे
देखो कि रह न जाए कहीं कुछ कसर-वसर

इक रोज़ तुम भी तो ज़रा ख़ुद से निकल मिलो
तय कर लिए हैं मैं ने तो सारे सफ़र-वफ़र

नफ़रत तिरी या प्यार हो ग़म हो शराब हो
मुमकिन नहीं है थोड़े में अपनी गुज़र-बसर

तू क्या गई मैं हो गया हूँ सख़्त-जान माँ
लगती नहीं है अब तो मुझे कुछ नज़र-वज़र

मुद्दत से कुछ भी तो तेरी चलती नहीं ख़ुदा
रक्खा तू कर जहान की भी कुछ ख़बर-वबर

बस 'इश्क़ का है मारा तो कुछ शे'र कह दिए
वर्ना है ‘आश्ना’ में कहाँ कुछ हुनर-वुनर

  - Vineet Aashna

Sharaab Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Vineet Aashna

As you were reading Shayari by Vineet Aashna

Similar Writers

our suggestion based on Vineet Aashna

Similar Moods

As you were reading Sharaab Shayari Shayari