nasha pila ke girana to sab ko aata hai | नशा पिला के गिराना तो सब को आता है

  - Allama Iqbal

नशा पिला के गिराना तो सब को आता है
मज़ा तो तब है कि गिरतों को थाम ले साक़ी

  - Allama Iqbal

Nasha Shayari

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    शराब खींची है सब ने ग़रीब के ख़ूँ से
    तू अब अमीर के ख़ूँ से शराब पैदा कर

    तू इंक़लाब की आमद का इंतिज़ार न कर
    जो हो सके तो अभी इंक़लाब पैदा कर
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    Asrar Ul Haq Majaz
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    शराबों से ख़ुमारी आ रही है
    नशा तेरा उतरता जा रहा है
    anupam shah
    ऐ शैख़ तू शराब के पीछे न पड़ कभी
    ये ख़ुद को वाहियात बनाने की चीज़ है
    Shivsagar Sahar
    खद्दर पहन के बेच रहा था शराब वो
    देखा मुझे तो हाथ में झंडा उठा लिया

    मैं भी कोई गँवार सिपाही न था जनाब
    मैंने भी जाम फेंक के डंडा उठा लिया
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    Paplu Lucknawi
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    नमकीं गोया कबाब हैं फीके शराब के
    बोसा है तुझ लबाँ का मज़े-दार चटपटा
    Abroo Shah Mubarak
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    बोसाँ लबाँ सीं देने कहा कह के फिर गया
    प्याला भरा शराब का अफ़्सोस गिर गया
    Abroo Shah Mubarak
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    सब को मारा 'जिगर' के शेरों ने
    और 'जिगर' को शराब ने मारा
    Jigar Moradabadi
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    ये कैसा नश्शा है मैं किस अजब ख़ुमार में हूँ
    तू आ के जा भी चुका है मैं इंतिज़ार में हूँ
    Muneer Niyazi
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    फ़ुर्सत नहीं मुझे कि करूँ इश्क़ फिर से अब
    माज़ी की चोटों से अभी उभरा नहीं हूँ मैं

    डर है कहीं ये ऐब उसे रुस्वा कर न दे
    सो ग़म में भी शराब को छूता नहीं हूँ मैं
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    Harsh saxena
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    शायद शराब पीके तुम्हें फ़ोन मैं करूँ
    बस इसलिए शराब कभी पी नहीं मैंने
    Tanoj Dadhich
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As you were reading Shayari by Allama Iqbal

    न आते हमें इस में तकरार क्या थी
    मगर वा'दा करते हुए आर क्या थी

    तुम्हारे पयामी ने सब राज़ खोला
    ख़ता इस में बंदे की सरकार क्या थी

    भरी बज़्म में अपने आशिक़ को ताड़ा
    तिरी आँख मस्ती में हुश्यार क्या थी

    तअम्मुल तो था उन को आने में क़ासिद
    मगर ये बता तर्ज़-ए-इंकार क्या थी

    खिंचे ख़ुद-बख़ुद जानिब-ए-तूर मूसा
    कशिश तेरी ऐ शौक़-ए-दीदार क्या थी

    कहीं ज़िक्र रहता है 'इक़बाल' तेरा
    फ़ुसूँ था कोई तेरी गुफ़्तार क्या थी
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    Allama Iqbal
    दुनिया की महफ़िलों से उकता गया हूँ या रब
    क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो
    Allama Iqbal
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    हज़ार ख़ौफ़ हो लेकिन ज़बाँ हो दिल की रफ़ीक़
    यही रहा है अज़ल से क़लंदरों का तरीक़

    हुजूम क्यूँ है ज़ियादा शराब-ख़ाने में
    फ़क़त ये बात कि पीर-ए-मुग़ाँ है मर्द-ए-ख़लीक़

    इलाज-ए-ज़ोफ़-ए-यक़ीं इन से हो नहीं सकता
    ग़रीब अगरचे हैं 'राज़ी' के नुक्ता-हाए-दक़ीक़

    मुरीद-ए-सादा तो रो रो के हो गया ताइब
    ख़ुदा करे कि मिले शैख़ को भी ये तौफ़ीक़

    उसी तिलिस्म-ए-कुहन में असीर है आदम
    बग़ल में उस की हैं अब तक बुतान-ए-अहद-ए-अतीक़

    मिरे लिए तो है इक़रार-ए-बिल-लिसाँ भी बहुत
    हज़ार शुक्र कि मुल्ला हैं साहिब-ए-तसदीक़

    अगर हो इश्क़ तो है कुफ़्र भी मुसलमानी
    न हो तो मर्द-ए-मुसलमाँ भी काफ़िर ओ ज़िंदीक़
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    Allama Iqbal
    हर इक मक़ाम से आगे मक़ाम है तेरा
    हयात ज़ौक़-ए-सफ़र के सिवा कुछ और नहीं
    Allama Iqbal
    दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं है
    फिर इस में अजब क्या कि तू बेबाक नहीं है

    है ज़ौक़-ए-तजल्ली भी इसी ख़ाक में पिन्हाँ
    ग़ाफ़िल तू निरा साहिब-ए-इदराक नहीं है

    वो आँख कि है सुर्मा-ए-अफ़रंग से रौशन
    पुरकार ओ सुख़न-साज़ है नमनाक नहीं है

    क्या सूफ़ी ओ मुल्ला को ख़बर मेरे जुनूँ की
    उन का सर-ए-दामन भी अभी चाक नहीं है

    कब तक रहे महकूमी-ए-अंजुम में मिरी ख़ाक
    या मैं नहीं या गर्दिश-ए-अफ़्लाक नहीं है

    बिजली हूँ नज़र कोह ओ बयाबाँ पे है मेरी
    मेरे लिए शायाँ ख़स-ओ-ख़ाशाक नहीं है

    आलम है फ़क़त मोमिन-ए-जाँबाज़ की मीरास
    मोमिन नहीं जो साहिब-ए-लौलाक नहीं है
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    Allama Iqbal

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