maana ki meraa jism ye jootha gilaas hai | माना कि मेरा जिस्म ये जूठा गिलास है

  - Vineet Aashna

माना कि मेरा जिस्म ये जूठा गिलास है
लेकिन ये दिल तो आज भी कोरा गिलास है

कितनी है कैसी मय है यही बात है बड़ी
चाँदी या काँच का सही रहता गिलास है

कुछ तिश्नगी भी रखनी थी जानाँ सँभाल के
तुम ने हिफ़ाज़तों से जो रक्खा गिलास है

पीने का लुत्फ़ है तभी जब ये रहे न इल्म
तेरा गिलास है कि ये मेरा गिलास है

क़ीमत तो मेरी प्यास की भी कम नहीं हुज़ूर
ये और बात आप का महँगा गिलास है

तुम को भी इस जहान का आ ही गया चलन
पीने के बाद तुम ने भी फेंका गिलास है

मुँह से लगा मैं पी गया बोतल तो शोर क्यूँ
शिद्दत की प्यास को कहाँ मिलता गिलास है

दुनिया का मैं ज़रूर हूँ पर शाम ही तलक
फिर उस के बाद तो मिरी दुनिया गिलास है

  - Vineet Aashna

Ilm Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Vineet Aashna

As you were reading Shayari by Vineet Aashna

Similar Writers

our suggestion based on Vineet Aashna

Similar Moods

As you were reading Ilm Shayari Shayari