moond kar bas aankh apni un manaazir ke KHilaaf | मूँद कर बस आँख अपनी उन मनाज़िर के ख़िलाफ़

  - Vineet Aashna

मूँद कर बस आँख अपनी उन मनाज़िर के ख़िलाफ़
कर रहे हैं हम बग़ावत दौर-ए-हाज़िर के ख़िलाफ़

तुझ तलक आवाज़ मेरी जाते जाते खो गई
रास्ते सब हो गए हैं इस मुसाफ़िर के ख़िलाफ़

हौसला जो है तो ललकारो ख़ुदा को भी कभी
क्या मिलेगा तुम को हो कर हम से काफ़िर के ख़िलाफ़

एक अदना दिल के हाथों दोनों हैं मजबूर हम
आओ था
में हाथ हम उस शय-ए-शातिर के ख़िलाफ़

इक तरफ़ था मैं निहत्था इक तरफ़ वो गुल-बदन 'इश्क़ की बाज़ी मैं हारा एक माहिर के ख़िलाफ़

एक इक कर के सभी पुर्ज़े उसी के हो गए
अब बदन में हूँ मैं तन्हा हुस्न-ए-जाबिर के ख़िलाफ़

'आश्ना' फिर ख़्वाब में आया नहीं तू रात भर
तू भी शायद हो गया है एक शाइ'र के ख़िलाफ़

  - Vineet Aashna

Awaaz Shayari

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