meri khaamoshiyon mein larzaan hai | मेरी ख़ामोशियों में लर्ज़ां है

  - Faiz Ahmad Faiz

मेरी ख़ामोशियों में लर्ज़ां है
मेरे नालों की गुम-शुदा आवाज़

  - Faiz Ahmad Faiz

Protest Shayari

Our suggestion based on your choice

    ऐसे इक़रार में इंकार के सौ पहलू हैं
    वो तो कहिए कि लबों पे न तबस्सुम आए
    Asad Bhopali
    22 Likes
    इस शहर में जीने के अंदाज़ निराले हैं
    होंटों पे लतीफ़े हैं आवाज़ में छाले हैं
    Javed Akhtar
    42 Likes
    अब के हम तर्क-ए-रसूमात करके देखते हैं
    बीच वालों के बिना बात करके देखते हैं

    इससे पहले कि कोई फ़ैसला तलवार करे
    आख़िरी बार मुलाक़ात करके देखते हैं
    Read Full
    Abrar Kashif
    64 Likes
    तुमको फ़िराक-ए-यार ने मिस्मार कर दिया
    मुझको फ़िराक-ए-यार ने फ़नकार कर दिया

    गुल से मुतालिबा जो किया बोसे का शजर
    गुल ने हिला के पत्तियाँ इनकार कर दिया
    Read Full
    Shajar Abbas
    अपना हर तिनका समेटे किस जगह पर जा छुपे
    हम तिरी आवाज़ की चिड़ियों से घबराते हुए
    Swapnil Tiwari
    27 Likes
    आवाज़ दे के देख लो शायद वो मिल ही जाए
    वर्ना ये उम्र भर का सफ़र राएगाँ तो है
    Muneer Niyazi
    45 Likes
    ये भी एजाज़ मुझे इश्क़ ने बख़्शा था कभी
    उस की आवाज़ से मैं दीप जला सकता था
    Ahmad Khayal
    26 Likes
    अब उस के दर से भी आवाज़ आती है कि नहीं
    बता रे ज़िन्दगी तू बाज़ आती है कि नहीं

    बहकने लगता है जब जब किसी के प्यार में दिल
    तो तेरी याद यूंँ आके डराती है कि नहीं
    Read Full
    Faiz Ahmad
    ख़ामोशी में आवाज़ का किरदार कोई है
    जो बोलता रहता है लगातार, कोई है
    Shakeel Gwaliari
    56 Likes
    साहिल के सुकूँ से किसे इंकार है लेकिन
    तूफ़ान से लड़ने में मज़ा और ही कुछ है
    Aale Ahmad Suroor
    46 Likes

More by Faiz Ahmad Faiz

As you were reading Shayari by Faiz Ahmad Faiz

    हमीं से अपनी नवा हम-कलाम होती रही
    ये तेग़ अपने लहू में नियाम होती रही

    मुक़ाबिल-ए-सफ़-ए-आदा जिसे किया आग़ाज़
    वो जंग अपने ही दिल में तमाम होती रही

    कोई मसीहा न ईफ़ा-ए-अहद को पहुँचा
    बहुत तलाश पस-ए-क़त्ल-ए-आम होती रही

    ये बरहमन का करम वो अता-ए-शैख़-ए-हरम
    कभी हयात कभी मय हराम होती रही

    जो कुछ भी बन न पड़ा 'फ़ैज़' लुट के यारों से
    तो रहज़नों से दुआ-ओ-सलाम होती रही
    Read Full
    Faiz Ahmad Faiz
    अब वही हर्फ़-ए-जुनूँ सब की ज़बाँ ठहरी है
    जो भी चल निकली है वो बात कहाँ ठहरी है

    आज तक शैख़ के इकराम में जो शय थी हराम
    अब वही दुश्मन-ए-दीं राहत-ए-जाँ ठहरी है

    है ख़बर गर्म कि फिरता है गुरेज़ाँ नासेह
    गुफ़्तुगू आज सर-ए-कू-ए-बुताँ ठहरी है

    है वही आरिज़-ए-लैला वही शीरीं का दहन
    निगह-ए-शौक़ घड़ी भर को जहाँ ठहरी है

    वस्ल की शब थी तो किस दर्जा सुबुक गुज़री थी
    हिज्र की शब है तो क्या सख़्त गिराँ ठहरी है

    बिखरी इक बार तो हाथ आई है कब मौज-ए-शमीम
    दिल से निकली है तो कब लब पे फ़ुग़ाँ ठहरी है

    दस्त-ए-सय्याद भी आजिज़ है कफ़-ए-गुल-चीं भी
    बू-ए-गुल ठहरी न बुलबुल की ज़बाँ ठहरी है

    आते आते यूँही दम भर को रुकी होगी बहार
    जाते जाते यूँही पल भर को ख़िज़ाँ ठहरी है

    हम ने जो तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ की है क़फ़स में ईजाद
    'फ़ैज़' गुलशन में वही तर्ज़-ए-बयाँ ठहरी है
    Read Full
    Faiz Ahmad Faiz
    ये आरज़ू भी बड़ी चीज़ है मगर हमदम
    विसाल-ए-यार फ़क़त आरज़ू की बात नहीं
    Faiz Ahmad Faiz
    24 Likes
    और क्या देखने को बाक़ी है
    आप से दिल लगा के देख लिया
    Faiz Ahmad Faiz
    26 Likes
    वफ़ा-ए-वादा नहीं वादा-ए-दिगर भी नहीं
    वो मुझ से रूठे तो थे लेकिन इस क़दर भी नहीं

    बरस रही है हरीम-ए-हवस में दौलत-ए-हुस्न
    गदा-ए-इश्क़ के कासे में इक नज़र भी नहीं

    न जाने किस लिए उम्मीद-वार बैठा हूँ
    इक ऐसी राह पे जो तेरी रहगुज़र भी नहीं

    निगाह-ए-शौक़ सर-ए-बज़्म बे-हिजाब न हो
    वो बे-ख़बर ही सही इतने बे-ख़बर भी नहीं

    ये अहद-ए-तर्क-ए-मोहब्बत है किस लिए आख़िर
    सुकून-ए-क़ल्ब उधर भी नहीं इधर भी नहीं
    Read Full
    Faiz Ahmad Faiz

Similar Writers

our suggestion based on Faiz Ahmad Faiz

Similar Moods

As you were reading Protest Shayari Shayari