“तजर्बा”

बिछड़ते वक़्त अपने प्यार का इज़हार करना हो
या फिर उस से बिछड़ कर और ज़्यादा प्यार करना हो
मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है

अगर घर वालों के आगे हो ख़ुश ऐसा जताना हो
या माँ के पूछने पर ग़म सफ़ाई से छिपाना हो
मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है

कभी याद आने पर उस के तुझे नज़रें चुराना हो
या शब को याद करना और दिन में भूल जाना हो
मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है

किसी के पूछने पर हर दफ़ा इनकार करना हो
या फिर तन्हाई में गर याद उसे हर बार करना हो
मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है

अगर यारों के आगे दिल से तुझ को सख़्त होना हो
या फिर इक दोस्त के कंधे प सर रख ख़ूब रोना हो
मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है

किसी के साथ उस ने ज़िंदगी अपनी बसा ली हो
या फिर तू ने उसे ही ज़िंदगी अपनी बना ली हो
मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है

हो मन में और कुछ लेकिन उसे कुछ और बताना हो
या दिल में दर्द हो लेकिन लबों से मुस्कुराना हो
मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है

किसी महफ़िल में उस के वास्ते पहचान बनना हो
या उस का नाम आते ही तुझे अनजान बनना हो
मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है

न उस के पास तेरी कोई भी पिछली निशानी हो
मगर फिर भी वो तुझ को याद बिल्कुल मुँह-ज़बानी हो
मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है

कि उस के ग़म में उस के साथ मीलों दूर जाना हो
या फिर उस की ख़ुशी ख़ातिर क़दम पीछे हटाना हो
मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है

कि उस को जानने के वास्ते कुछ झूठ कहना हो
या सब सच जानने के बा'द भी ख़ामोश रहना हो
मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है

कुछ इक लम्हों में पूरी ज़िंदगी की मौज पानी हो
या पूरी ज़िंदगी कुछ लम्हों के ज़द में बितानी हो
मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है

बग़ैर उस के कोई लम्हा कभी जीया न जाता हो
या उस के साथ रहना ही फ़क़त इक फ़र्ज़ जैसा हो
मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है

उसे बस में बिठा के घर तक उस को छोड़ आना हो
या उस की बस निकल जाने पे पीछे छूट जाना हो
मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है

नहीं अब वो तेरा ये जानकर भी साथ देना हो
या फिर इक फ़ैसला तन्हा यूँॅं ही रहने का लेना हो
मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है

— SHIV SAFAR

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