"मय्यत”
मुझे मालूम है तन्हा कोई छोड़े तो क्या होगा
कोई अपना अगर बाँहों में दम तोड़े तो क्या होगा
उसी इक पल में मानो उम्र सारी बीत जाती है
हमारे आगे बैठी मौत हम पे मुस्कुराती है
समझ उस पल नहीं आता कि रोएँ या कि साँसें लें
या उन की लाश पर ही सर पटक कर हम भी जाँ दे दें
ख़ुदा के आगे घुटने टेक कर हम गिड़गिड़ाते हैं
कि अपना वास्ता देकर उन्हें वापस बुलाते हैं
मगर उस रब के कानों तक न चीख़ें अपनी जाती हैं
किसी बादल से टकरा कर दुआएँ लौट आती हैं
हमें उस वक़्त भी ये ज़िंदगी क्या ख़ूब ठगती है
न आँसू सूख भी पाते कि मय्यत उठने लगती है
ये बस कहने की बातें है कि दुनिया छोड़ जाते हैं
वो बनकर याद सीने में बराबर जाते आते हैं
न मिट्टी में गड़े रहते न नदियों में वो बहते हैं
है सच तो ये हमेशा से हमी में दफ़्न रहते हैं
अगर ख़ुद मौत से रिश्ता कोई जोड़े तो क्या होगा
कोई अपना अगर बाहों में दम तोड़े तो क्या होगा
मुझे मालूम है तन्हा कोई छोड़े तो क्या होगा















