क़ाबिल तो हो गया तुझे हासिल न हो सका

या'नी कि जिस्म रह गया मैं दिल न हो सका

इक वो फ़क़त नज़र से ही करते हैं क़त्ल-ए-'आम
याँ मैं कमाँ भी खींच के क़ातिल न हो सका

शब भर ग़ज़ल की चाह में टहला हूँ बाम पर
कम्बख़्त एक शे'र भी नाज़िल न हो सका

अब सर ही फोड़ ग़ैरों के दीवार-ए-दिल से तू
जब अपनी दिल-शिगाफ़ी का क़ाइल न हो सका

सोचा था अब यही है एक रास्ता मगर
मर के भी उस की याद में शामिल न हो सका

पहुँचा मुहब्बतें कमा के जब सुख़न से घर
दर कह के रो पड़ा कि मैं क़ाबिल न हो सका

मतलब उस एक शख़्स से सच मुच का इश्क़ था
शायद तभी ही वो मुझे हासिल न हो सका

अब तन्हा हूँ तो आया है ठोकर में मेरी संग
हिजरत को जा रहा था तो हाइल न हो सका

तेरे सुख़न-शनास का क्या फ़ाइदा मैं गर
तेरी निगाह-ए-नाज़ के क़ाबिल न हो सका

मुझ पे पड़ा यूँ मेरे तख़ल्लुस का कुछ असर
आख़िर ‘सफ़र’ ही रह गया मंज़िल न हो सका

— SHIV SAFAR

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