अब तेरी ज़रूरत भी बहुत कम है मिरी जाँ

अब शौक़ का कुछ और ही आलम है मिरी जाँ

अब तज़्किरा-ए-ख़ंदा-ए-गुल बार है जी पर
जाँ वक़्फ़-ए-ग़म-ए-गिर्या-ए-शबनम है मिरी जाँ

रुख़ पर तिरे बिखरी हुई ये ज़ुल्फ़-ए-सियह-ताब
तस्वीर-ए-परेशानी-ए-आलम है मिरी जाँ

ये क्या कि तुझे भी है ज़माने से शिकायत
ये क्या कि तिरी आँख भी पुर-नम है मिरी जाँ

हम सादा-दिलों पर ये शब-ए-ग़म का तसल्लुत
मायूस न हो और कोई दम है मिरी जाँ

ये तेरी तवज्जोह का है ए'जाज़ कि मुझ से
हर शख़्स तिरे शहर का बरहम है मिरी जाँ

ऐ नुज़हत-ए-महताब तिरा ग़म है मिरी ज़ीस्त
ऐ नाज़िश-ए-ख़ुर्शीद तिरा ग़म है मिरी जाँ

— Habib Jalib

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