ख़ूब आज़ादी-ए-सहाफ़त है
नज़्म लिखने पे भी क़यामत है
दा'वा जम्हूरियत का है हर-आन
ये हुकूमत भी क्या हुकूमत है
धाँदली धोंस की है पैदावार
सब को मा'लूम ये हक़ीक़त है
ख़ौफ़ के ज़ेहन-ओ-दिल पे साए हैं
किस की इज़्ज़त यहाँ सलामत है
कभी जम्हूरियत यहाँ आए
यही 'जालिब' हमारी हसरत है
— Habib Jalib















