khoob azaadi-e-sahaafat hai | ख़ूब आज़ादी-ए-सहाफ़त है

  - Habib Jalib

ख़ूब आज़ादी-ए-सहाफ़त है
नज़्म लिखने पे भी क़यामत है

दा'वा जम्हूरियत का है हर-आन
ये हुकूमत भी क्या हुकूमत है

धाँदली धोंस की है पैदावार
सब को मा'लूम ये हक़ीक़त है

ख़ौफ़ के ज़ेहन-ओ-दिल पे साए हैं
किस की इज़्ज़त यहाँ सलामत है

कभी जम्हूरियत यहाँ आए
यही 'जालिब' हमारी हसरत है

  - Habib Jalib

Self respect Shayari

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    Habib Jalib
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    जाँ वक़्फ़-ए-ग़म-ए-गिर्या-ए-शबनम है मिरी जाँ

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    ये क्या कि तिरी आँख भी पुर-नम है मिरी जाँ

    हम सादा-दिलों पर ये शब-ए-ग़म का तसल्लुत
    मायूस न हो और कोई दम है मिरी जाँ

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    Habib Jalib
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    तुझ को माना बड़ा बजा माना

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    तुझ को पर्वा न थी ज़माने की
    तू ने दिल ही का हर कहा माना

    तुझ को ख़ुद पे था ए'तिमाद इतना
    ख़ुद ही को तो न रहनुमा माना

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    यूँ तो शाइ'र थे और भी ऐ 'जोश'
    हम ने तुझ सा न दूसरा माना
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    Habib Jalib
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    उसे था शौक़ बहुत मुझ को अच्छा रखने का
    ये शौक़ औरों को शायद बुरा लगा होगा

    कभी न हद्द-ए-अदब से बढ़े थे दीदा ओ दिल
    वो मुझ से किस लिए किसी बात पर ख़फ़ा होगा

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    नहीं वो आया तो 'जालिब' गिला न कर उस का
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    Habib Jalib

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