नग़्मा भी है उदास तो सर भी है बे-अमाँ

रहने दो कुछ तो नूर अँधेरों के दरमियाँ
इक उम्र जिस ने चैन दिया इस जहान को
लेने दो सुख का साँस उसे भी सर-ए-जहाँ
तय्यार कौन है जो मुझे बाज़ुओं में ले
इक ये नवा न हो तो कहो जाऊँ मैं कहाँ
अगले जहाँ से मुझ को यही इख़्तिलाफ़ है
ये सूरतें ये गीत सदाएँ कहाँ वहाँ
ये है अज़ल से और रहेगा ये ता-अबद
तुम से न जल सकेगा तरन्नुम का आशियाँ

— Habib Jalib

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