darakht sookh ga.e ruk ga.e nadi naale | दरख़्त सूख गए रुक गए नदी नाले

  - Habib Jalib

दरख़्त सूख गए रुक गए नदी नाले
ये किस नगर को रवाना हुए हैं घर वाले

कहानियाँ जो सुनाते थे अहद-ए-रफ़्ता की
निशाँ वो गर्दिश-ए-अय्याम ने मिटा डाले

मैं शहर शहर फिरा हूँ इसी तमन्ना में
किसी को अपना कहूँ कोई मुझ को अपना ले

सदा न दे किसी महताब को अंधेरों में
लगा न दे ये ज़माना ज़बान पर ताले

कोई किरन है यहाँ तो कोई किरन है वहाँ
दिल ओ निगाह ने किस दर्जा रोग हैं पाले

हमीं पे उन की नज़र है हमीं पे उन का करम
ये और बात यहाँ और भी हैं दिल वाले

कुछ और तुझ पे खुलेंगी हक़ीक़तें 'जालिब'
जो हो सके तो किसी का फ़रेब भी खा ले

  - Habib Jalib

Kahani Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Habib Jalib

As you were reading Shayari by Habib Jalib

Similar Writers

our suggestion based on Habib Jalib

Similar Moods

As you were reading Kahani Shayari Shayari